22 अभक्ष्य पदार्थ – पार्ट 4 Recipe by Jain Rasoi 49 days ago

22 अभक्ष्य पदार्थ - पार्ट 4
    A] 4 सांयोगिक अभक्ष्य

    4] रात्रिभोजन त्याग

    पूर्व के विषयों में हमने पढ़ा कि सीज़न बदलते हि हवामान बदल जाते हैं । हवामान परिवर्तन से भक्ष्य पदार्थ भी अभक्ष्य बन जाते हैं। इसी तरह दिन में भक्ष्य खाद्य पदार्थ रात के समय अभक्ष्य-बेस्वाद बन जाते हैं । जैसे सूर्य की हाजरी में मानव के शरीर में टेम्प्रेचर का फर्क पड़ जाता है। जैसे वनस्पतियों पर सूर्यप्रकाश की असर होती है। वैसे ही सूर्य की हाजरी में भोजन सही-सलाम रहता है । सूर्यास्त के बाद पकाया हुआ भोजन विकृत हो जाता है। जैसे आकाश में आद्रा नक्षत्र लगने के बाद धरती पर आम का स्वाद अपने आप बदल जाता है वैसे ही सूर्यास्त होने के बाद रसोई का स्वाद अपनेआप बदल जाता है ।

    तदुपरांत सूर्यास्त बाद कितने ही सूक्ष्म जंतु चारों ओर उड़ना चालू कर देते हैं । ये सूक्ष्म जंतु फ्लडलाइट के प्रकाश में भी आंखो से नहीं दिख सकते । जैसे पक्षीयों में दिन में उडने वाले और रात्रि में उडने वाले ये दो विभाग होते हैं, जैसे पशुओं में भी दिन में चरनेवाले और रात्रि में चरनेवाले ये दो विभाग होते हैं वैसे ही सूक्ष्म जंतुओ में भी दिन में उडनेवाले और रात में उडने वाले ऐसे दो विभाग होते है । इन जंतुओं को हॉस्पीटल का स्टरीलाईज़ड वातावरण भी नहीं रोक सकता । इसलिये डॉक्टर लोग भी मेज़र ऑपरेशन में डे-लाइट की अपेक्षा रखते हैं । रात्रि मे चाहें कितनी हि फ्लडलाइट हो परंतु रात्रिचर सूक्ष्म-किटाणुओं को देख नहीं सकते, उडते हुए रोक नहीं सकते, वे किटाणु ऑपरेशन में खुल्ले भाग पर चोंटे तो ऑपरेशन फेल हो जाता है । इसलिए रात्रि में ऑपरेशन करना डॉक्टर भी टालते हैं । रात्रि में तैयार की हुई ताजी रसोई पर भी सैंकडो सूक्ष्म-कीटाणु अपना अड्डा जमा देते हैं। भोजन करते वक्त ये सब पेट में जाते हैं । इसलिये रात्रिभोजन अयोग्य । दिनभर परिश्रम से शरीर थका हुआ हो तब उसे विश्राम देने की जरूरत होती है । पूर्ण विश्राम मिले तो सबेरे शरीर में स्कूर्ति आती है । आज का व्यक्ति पूरा दिन भटकते रहता है, फिर रात्रि में 1० बजे शरीर पूर्ण विश्राम मांगता है तब उसे भोजन है । होजरी की पूरी थैली फूलटाईट करके व्यक्ति सोने का प्रयत्न करता है । पर नींद नहीं आती कि शरीर सोने का काम करें या अंदर गए भोजन को पचाने का काम करें? दो काम एक साथ नहीं हो सकता । यदि व्यक्तिए को नींद आ गइ तो पेट में जो माल सप्लाय किया है वह पचे बिना ऐसा ही पडा रहेगा । वह पड़े पड़े सड़ेगा और एसीडीटी जैसे अनेक रोग पैदा करेगा । व्यक्ति अगर जगता रहेगा तो जागरन होगा और माथा दुःखने लगेगा, दोनों तरफ उपाधि है। इससे तो अच्छा है कि रात्रि में खाना ही नहीं।

    एक श्लोक में नरक के चार द्वार बताये है । उसमें प्रथम द्वार रात्रिभोजन को कहा है।

    कितनी सावधानियाँ :

    A. रात्रिभोजन के त्यागियों को शाम के समय घडी का काटां देखते रहना चाहिये। सूर्यास्त का समय रोज ध्यान में रखना चाहिए एकदम आखिरी टाईम में भोजन करने से "लगभग वेलाअे वालुं कीधुं' ऐसा अतिचार लगता है। इसलिये खाना, मुंह साफ करना, दवा लेना एवं पानी चूकाना (पीना) आदि का समय निकालकर भोजन कर लेना चाहिये ।

    B. सूर्योदय के बाद सबेरे नवकारशी के लिये दो घडी का समय पालते है वैसे ही सूर्यास्त के पूर्व भी दो घडी का समय पालना चाहिये और शक्य हो तो दो घडी पूर्व ही चउविहार कर लेना चाहिये।

    C. नौकरी-धंधा आदि के कारण बजार से घर पहुँच नहीं सकते उनको घर से टिफिन साथ में ले जाना चाहिये । आज-कल अमदाबाद में मस्कती मार्केट में अनेक जैन व्यापारी शाम का खाना टिफिन में खाते हैं । मुंबई जैसे शहर में भी चार्तुमास दरम्यान "चउविहार हाउस' चालू हुए हैं। जो कि संध्या के समय पूरा भरा रहता हैं, अब तो हमेशा के लिये चउबिहार हाउस बम्बई में चालू हो गया हैं । यदि मुंबइ की लाइफ जीनेवाले व्यक्ति भी चउविहार पाल सकते है तो अन्य शहरों, गाँवों में भी लोग मन में निश्चय करे तो निश्चित चउविहार का लाभ ले सकते हैं ।

    D. पति रात्रिभोजन करते हैं इस कारण बहनों को भी अनिच्छा से रात्रिभोजन करना पडता हैं । इस तरह एक के कारण दोनों पाप में पडते हैं । इससे अच्छा तो भाइयों को चउविहार चालू कर देना चाहिए । जिससे बहनों को भी चउविहार का लाभ मिल जाये ।

    E. आज की जिन्सी पीढ़ी में विवाह होने के बाद रविवार को घूमने और होटल में खाने का क्रेज़ बढ़ता चला हैं । पूरे एक सप्ताह तक पेट भरकर दवाई खा सके इतना कचरा रविवार को मानव पेट में डालता हैं । ज्यादातर व्यक्तियों की तबियत सोमवार/मंगलवार को बिगडती हैं, इसका कारण रविवार होता हैं । सप्ताह के सात दिनों में से छ : दिन तो मानव सीधा चलता हैं परन्तु रविवार को उसकी चानक चसक जाती हैं । रविवार को रात्रि में ८ से 1२ बजे के बीच भारतभर की आधी बस्ती लगभग पागल की स्थिति में रहती हैं । "टेम्पररी मेडनेस' के बीच मानव खाना, पीना, खेलना और भोग करके अनेक पाप कर लेता हैं । जिसको रविवार के टेम्पररी मेडनेस से और परमेनेन्ट बीमारी से बचना हो तो ज्यादा नहीं केवल एक प्रतिज्ञा लेनी चाहिये कि, 'रविवार को रात्रि में घर से बाहर निकलना नहीं ।'

    F. रात्रि में 1२ बजे के बाद यदि न खाए तो वे सबेरे नवकारशी का पच्चक्खाण कर सकते हैं ।

    G. रात्रि में चउविहार का पच्चज्जाण नहीं कर सकते तो मात्र पानी की छूट रखकर तिविहार का पच्चक्खाण कर सकते हैं । रात्रिभोजन त्याग नियम पालना हो और रात्रि में दवा लेनी पडे तो दवा के लिये दुविहार का पच्चक्खाण भी कर सकते हैं । पानी ओर दवा की छूट के लिये पूरी जिदंगी रात्रिभोजन करने की जरा भी जरुरत नहीं हैं ।

    भोजन की चउभंगी
    दिन में बना हुआ रात को खाना
    रात को बना हुआ दिन में खाना
    रात को बना हुआ रात में खाना
    दिन में बना हुआ दिन में खाना

    चार प्रकार के भेद में से मात्र आखिरी भेद शुद्ध हैं । बाकी के तीनों भेद अशुद्ध हैं । रात्रिभोजन करना तो पाप है परन्तु रात को बनाई हुइ रसोई, खाखरा सेंकना आदि कार्य करना भी पाप स्वरुप हैं । इस-तरह रात्रिविराधना करके बनाया हुआ खाना दिन में खाने से रात्रिभोजन का दोष नहीं परन्तु आरम्भ-समारम्भ का बड़ा दोष लगता हैं । भोजन के जैसे ही अन्य कार्य भी रात्रि में नहीं करना चाहिये । कोई भी चीज रात्रि में नहीं बनानी चाहिए । बजार में से जाए हुए खाद्य पदार्थ तो दिन-रात देखे बिना बनाए हुए होते हैं । इस कारण वे किसी भी तरह से खाने योग्य नहीं हैं ।
Source : Research of Dining Table by Acharya Hemratna Suriji

 

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