22 अभक्ष्य पदार्थ – पार्ट 1 Recipe by Jain Rasoi 52 days ago

22 अभक्ष्य पदार्थ - पार्ट 1
    A] 4 सांयोगिक अभक्ष्य

    1) द्विदल त्याग - जिसमें दो दल, दो विभाग हो ऐसे धान्य को कहते हैं । जिसकी दाल बनती हैं वे सब द्विदल कहलाते हैं। आज उपयोग में आनेवाले तमाम कठोल द्विदल जाने जाते हैं । जैसे :- मूंग, मसुर, उड़द, चना, मोंठ, चौला, वटाना, मेथी, लोंग की दाल । इन सबकी हरी पत्ती एवं हरे दाने, उनका आटा सभी द्विदल कहलाते है । द्विदल की व्याख्या :- (१) जो वृक्ष के फलरुप न हो, (२) जिसको पीलने से तेल न निकले, (३) जिसको दलने पर दाल बने, (४) जिसके दो भागों के बीच तह (पड) न हो । अंग्रेजी में जिसे 'डायकोटिलिडोन' कहते है । यह ४ लक्षण जिसमें घटते हो उसे द्विदल समझना अन्यथा नहि। राई, सरसव, तिल, मुंगफली में से तेल निकलता है, इसलिए वे द्विदल नहि कहलाते । सांगरी वृक्षके फलरुप है, इसलिए द्विदल नहि कहलाती ।
    समझ : उपरोक्त व्याख्या के अनुसार किसी भी कठोल से बनी हुई चीज कच्चे (१) दही, (२) दूध, (३) छास के साथ मिलने पर बेइन्द्रिय जीव की उत्पत्ति होती हैं, फिर उसका भक्षण करने पर हिंसा का दोष लगता है । इस कारण कच्चे गोरस के साथ कभी भी कठोल मिक्स करना नहीं । यदि दहीं, दूध, छास को गरम करके कठोल के साथ खाने में आये तो दोष नहीं लगता । अकेले सिर्फ कठोल की व्हैरायटी खाने में या सिर्फ अकेले गोरस खाने में कोई दोष नहीं परन्तु दोनों का संयोजन करके खाने में हिंसादि दोष लगता हैं । इस सांयोगिक दोष को द्विदल कहते है ।

    द्विदल का दोष कहा लगता है?

    a) दहीं वड़ा : प्रत्येक घर में तथा फंक्शन में दहींवड़ा बनता है । वड़ा मूंग, उड़द आदि की दाल से बनता है । उसके बाद उसपर, फ्रिज में से निकाला हुआ आईसक्रीम जैसा ठंडा दहीं डालते हैं । ये दहीं और वड़े का संयोग होने मात्र से तत्काल असंख्य बेइन्द्रिय जीव उत्पन्न हो जाते हैं । ये बॅक्टेरियाँ, कीड़े जिस चीज में पैदा होते हैं, वह चीज जैसे कलर की होती है वैसे ही कलर के कीड़े उत्पन्न होते हैं और अतिसूक्ष्म होने के कारण नज़र से दिखाई नहीं देते हैं । परमात्मा जिनेश्वरदेव तो कैवल्यज्ञान के स्वामी थे। उनको कोई लॅबोरेटरी की जरुरत नहीं थी । ज्ञानप्रकाश में परमात्मा ने जो जीवोत्पत्ति देखी है उसे हाउ अेन्ड व्हाय किए बिना मस्तक झुकाकर स्वीकारनी चाहिये । इस स्थान पर दहीं को वडेर के साथ मिक्स करने के पहले अच्छी तरह से गरम करके उपयोग में लाए तो दोष नहीं लगता । गरम करने के बाद खाते वक्त यदि वह ठंडा हो जाये तो हर्जा नहीं क्योंकि एकबार गरम करने के बाद फिर उसमें जो जीवोत्पादक शक्ति थी वह नष्ट हो जाती है ।

    b) रायता : दहीं का रायता अनेक प्रकार से बनता है, इसमें जब कठोल चनादाल के आटे की बनी बूंदी मिक्स करते हैं तो द्विदल का दोष लगता है । कठोल के साथ मिक्स करने के पहले दहीं को उबाल ले तो दोष नहीं ।

    c) मेथी के पराठे : मेथी कठोल की गिनती में आती है । इसी तरह मेथी की भाजी भी, कठोल की गिनती में आती है । आजकल महिलायें मेथी के पराठे बनाने बैठती हैं तो द्विदल की बात बिल्कुल भूल जाती हैं । थाली में गेहुँ, बाजरे के आटे को मिलाकर फिर उसमें मेथी के पत्ते मिला देती हैं और फिर उसमें कच्ची छास डालकर उसे बहने गूँथ लेती हैं । इस वक्त उन्हें यह ख्याल नहीं आता है कि तुम्हारे इस तरह गूंथे हुए आटे में पूरी मुंबई में न समाये इतने सूक्ष्म बेइन्द्रिय जीव-सृष्टि पैदा हो गई है । वे तुम्हारे दोनों हाथों से मसले जा रहे हैं । थोडे समय बाद तुम इन्हें वधस्तंभ (तवे) पर चढ़ा देने वाली हो । प्लीज! ऐसा मत करो । तुम्हारे आटा गूंथने के पहले छास गरम कर लो फिर उसके बाद मेथी की भाजी के साथ मिक्स करो ।

    d) कढ़ी : जब छास की कड़ी बनानी हो, तब बहनें चूले पर छास तपेली में चढ़ाकर गरम होने के पूर्व ही उसमें तुरंत बेसन डाल देती हैं । कच्ची छास में बेसन मिलते ही तत्काल असंख्य जीव पैदा हो जाते है । फिर जब कढ़ी उबलती हैं तब वे जीव तपेली में ही स्वाहा हो जाते हैं । इस तरह जीवों की उत्पत्ति और संहार दोनों का दोष एक साथ होता हैं । इसलिए गरम होने से पूर्व बेसन डालने की मूर्खता न करें । कढ़ी के साथ श्रीखंड खाना हो तो कढी मे बेसन के बजाय चावल का आटा डालना चाहिये । बघार में मेथी का उपयोग भूलकर भी न करे । बहुत लोग श्रीखंड के भोजन-समारोह में दोष से बचने के लिये साग में मूंगफल्ली का साग बनाते है । खमण भी चावल के आटे का बनाते है और कढ़ी में भी चावल का आटा डालते हैं । बहुत सावधानी रखने के बाद भी यदि कढ़ी के वघार में ध्यान न रखा हो तो हनुमान के पूंछ से पूरी लंका जल गई वैसे ही वघार (छमक) की पूंछ से पूरा भोजन-समारोह हिंसक बन जायेगा । इसलिये हो सके वहाँ तक भोजन-समारोह में श्रीखंड, दहींवड़ा वाली गोरस की व्हैरायटी बनाना ही नहीं ।

    e) श्रीखंड : लग्न समारोह में आजकल श्रीखंड का महिमा बढ़ता चला हैं । गरमी में लोग श्रीखंड का मेनू पसंद करते हैं । श्रीखंड खाने से खतरा खूब बढ़ जाता है । पूरे रसोईघर में यदि कोई कठोल की आइटम होगी तो खाते वक्त थाली में श्रीखंड के साथ मिक्स हो जाएगी । श्रीखंड की उपस्थिति में हरे, सूखे कठोल की सब्जी, केला-वड़ा, चने का खमण, खमण की चटनी, मूंग की दाल, पापड़, चने के आटे वाली और मेथी के बघार वाली कढ़ी ये कुछ भी नहीं चल सकता । इस कारण श्रीखंड को हमेशा के लिये सौ हाथ दूर से नमस्कार कर देना चाहिये ।

    f) ढ़ोकला : खट्टे ढ़ोकले बनाने के लिये कठोल के आटे का छास में घोल करते है । ये घोल करने के पहले छास को गरम कर लेना चाहिये । छास को गरम किये बिना सीधा आटा मिला दे तो द्विदल का दोष लगता है। इसलिये खास ध्यान रखना चाहिये।

    g) दहीं और मेथी के पराठे : बाहर गाँव जाना हो तब व्यक्ति साथ में मेथी के पराठे ले जाता है । पराठे चाय के साथ उपयोग आये तब तो ठीक हैं परन्तु कई व्यक्ति पराठे के साथ दहीं खाते है, तब उन्हें यह खाल नहीं होता है कि पराठे के अन्दर मेथी की भाजी डाली है । कच्चे दहीं के साथ मेथी का संयोग होगा तो असंख्य जीव उत्पन्न होंगे । इस कारण मेथी के पराठे के साथ दहीं न खाये । दहीं को गरम कर लेना जरुरी है। नहीं तो चाय के साथ पराठे खाये अथवा बिना मेथी और कठोल के पराठे बनाये ।

    h) आचार : श्रीखंड आदि के भोजन समारोह में लोग मेथी डाला हुआ आचार का उपयोग करते हैं । आचार में रही हुई मेथी और श्रीखंड का कच्चा दहीं मिक्स होते ही द्विदल होता है । इस दोष के त्याग के लिये मेथी वाला आचार उपयोग करना योग्य नहीं है।

    i) छास : कई परिवारों में खाने के बाद छास पीते हैं । भोजन की थाली में दाल, साग, भजिया आदि अनेक चीजों में कठोल का उपयोग होता हैं । फिर झूठे मुंह, झूठें हाथों से लोग तुरंत छास पीने लगते है । इस तरह कच्ची छास के साथ कठोल का संयोग होने से बेइंद्रिय कीड़े उत्पन्न होते है । दोष से बचने की इच्छा वाले नर-नारी सबेरे छास को अच्छी तरह गरम करके फिर दोपहर में भोजन के समय उपयोग करते है । यह रस्ता सरल और सेफ है । यदि कभी कच्ची छास पीने का प्रसंग आये तो हाथ मुंह बिल्कुल बराबर साफ करना चाहिये । कठोल का टच न हो इस तरह अलग से छास पीकर उस छास की ग्लास को अलग से साफ करके रखना चाहिए। कठोल के झूठे के साथ यदि ये ग्लास का संयोग हो जाए तो हिसा संभव है । इसलिये ये ग्लास अलग से साफ करके पानी पीना चाहिये जिससे कभी दोष लगने का संभव न रहे । पेट में अंदर जाने के बाद कठोल मिक्स हो तो द्विदल का दोष नही लगता क्योंकि शरीर में तो एक जबरदस्त अणुभट्टी चालू हैं । दूसरी बात यह है कि अन्दर दाखिल होने के साथ ही तुरन्त उसका रुपांन्तर शुरु हो जाता हैं । इस कारण पेट में कोई दोष नहीं लगता । थाली, कटोरी, हाथ और मुंह साफ होने चाहिये।

    j) कच्चा दूध : कच्चे दूध को उपयोग में लाने का प्रसंग बहुत कम आता है । घर में दूध की तपेली खुल्ली रखने से कभी उसमें कठोल, दाल या मेथी भाजी की पत्ती गिर जाने की संभावना है । इस तरह कच्चे दूध के साथ कठोल का समागम होने पर जीव उत्पन्न होंगे इसलिये कच्चे दूध को बराबर ढ़क कर संभालकर रखना चाहिये ।
Source : Research of Dining Table by Acharya Hemratna Suriji

 

1 Comment

 

  1. Newbie - 0 PointsHas been a member for 5-6Years
    July 16, 2015  4:55 pm by prabha Reply

    sirf dvidal or dahi, doodh, chaas ke milne se nahi, n\unke saath muha ki laar milne se becktiriya peda hote ha

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