पर्व-तिथि में हरी साग-भाजी का त्याग किस लिये? Recipe by Jain Rasoi 211 days ago

पर्व-तिथि में हरी साग-भाजी का त्याग किस लिये?
    जैनदर्शन ने तो शक्यत सदा के लिये हरी साफ-भाजी का त्याग करने की बात बताई हैं । इतना त्याग न हो सके तो महिने की 1२ बड़ी पद तिथि (दो बीज, दो पांचम, दो आठम, दो ग्यारस, दो चौदस, पूनम, अमावस) को हरी साग-भाजी के त्याग की बात कही है । आज के काल में भी चुस्त जैन कुटुंबों में इस नियम का अखंड रुप से पालन हो रहा है । 1२ तिथि नहीं तो आखिरी में पांच तिथियों में हरी शाकभाजी त्याग करनेवाले अनेक जैनी हैं ।

    राजस्थान तरफ के जैन तो आज भी हरी शाक-भाजी का बहुत कम उपयोग करते हैं । रोटी के साथ साग के बदले कठोल का उपयोग करते है । गुजरात के जैनों में साग-भाजी का प्रमाण अभी-अभी ज्यादा बढ़ गया है । जहाँ दो-चार दिन में एक बार एकाद साग बनाया जाता था वहाँ आज एक टाइम में एक साथ तीन-चार साग बनाए जाते हैं । पूर्व में मानव रोटी के साथ साग खाता था परंतु आज मानव साग के साथ रोटी खाता हैं । पहले एक भींडी में चार रोटी खाते थे । आज एक रोटी पूरी करने में चार भींडी स्वाहा हो जाली है । घर में, दावत में, चार-पांच साग बनाने में श्रीमंताई का स्टेटस माना जाता है । अब साग के साथ कच्चा सलाद और फ्रूट्‌स चालू हो गये हैं । इन परिस्थितियों में व्यक्ति जीभ का कंट्रोल खो बैठा है । भेड़-बकरे जिस तरह हरा चारा चरकर पेट भरतें हैं उसी तरह व्यक्ति भी पूरा दिन भाजी पर टूट पड़ता है ।

    मॉर्डन और फॉरवर्ड बनने की धून में व्यक्ति ने धर्म के आदेशों को तो माले पर चढाही दिया है साथ-साथ ये सागभाजी पर कातिल हमले के बाद व्यक्ति खुद के आरोग्य को भी हानि पहुंचा रहा है । 'साक-भाजी ' से आरोग्य को नुकसान पहुंचता है यह बात आज के एज्युकेटेड लोगों के दिमाग में नहीं उतरेंगी । क्योंकि आजकत्न चारों ओर कच्चा सत्राद और कच्चे कचुंबर की हवा है । आगे के पन्नों में डॉक्टर, वैद्य, वैज्ञानिक और साहित्यकारों के लेख दिये गये हैं । ये पढ़ने के बाद जो जैन होंगे वो तो भगवान महावीर के तत्त्वज्ञान पर और आहारशुद्धि के नियमों पर गौरव अनुभव किये बिना नहीं रहेंगे । भगवान की २५०० वर्ष पूर्व कही गई बातें वैज्ञानिकों को आज स्वीकारनी पड़ी है ।

    अाज के साइंस ने एक नई बात खोजी है । साइंस कहता है कि पर्वतिथियों के दिन चन्द्र और धरती के बीच आकर्षण बढ़ जाता है । जिससे धरती पर के जल पर चन्द्र का असर होता है और समुद्र की लहरे उछाल भरती है । समुद्र में भरती आती है । चन्द्र का असर मात्र समुद्र जल पर ही है ऐसा नहीं । नदी, कुंआ और सरोवर सब के जल पर चन्द्र का असर होता है । साइंस कहता है कि, 'मानव का शरीर भी 7०% पानी से भरा है । पर्वतिथि के दिनों में हमारे शरीर में रहे हुए जल में भी परिवर्तन आता है । उन दिनों में मन ज्यादा चंचल बनता है । ऐसा होने से चालू दिनों की अपेक्षा पर्वतिथि के दिनों में एक्सीडेन्ट, होनारत, बलात्कार आदि तमाम उपाधि बढ़ जाती है । रोज अखबार ध्यान से मार्क करें तो तुम्हे यह बात सच्ची लगे बिना नहीं रहेगी ।

    भगवान जिनेश्वर देव ने तो पर्वतिथि में उपवास का तप और पौषध का व्रत लेकर उपाश्रय मे ध्यान में बैठने की बात कही है । हरी साकभाजी के त्याग की बात भी ऊपर की बात के साथ मिलती है । शरीर में 7० प्रतिशत पानी है । उसमें हरी साग-भाजी खाने से पानी की वृद्धि होती है । पानी की वृद्धि होने से समुद्र की भरती जैसे सूक्ष्म तूफान तन, मन में भी उत्पन्न होते है । सब साइंटिफिक बातों को ध्यान में रखकर सबको प्रभु के हर एक वचन पर अथाग श्रद्धा धारण करके वनस्पति का उपयोग बंद कर देना चाहिये।
Source : Research of Dining Table by Acharya Hemratna Suriji

 

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