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	<title>Jain Rasoi &#187; jainrasoi23</title>
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	<description>Your final destination to healthy &#38; tasty Jain Recipes</description>
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		<title>Badam Payasam</title>
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		<pubDate>Tue, 17 Jun 2025 21:35:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2013/03/badam-payasam-600x408.jpg"/><br />
		The famous Indian dessert with the richness of almonds<br />		<p>40-45 almonds<br />
2 litres milk<br />
1 1/2 cup sugar<br />
few saffron strands<br />
1 teaspoon cardamom powder<br />
pistachio slivers (for garnishing)<br />
almonds (for garnishing)</p>
<p id="bte_opp"><small>Republished by  <a href="http://www.blogtrafficexchange.com/old-post-promoter/">Blog Post Promoter</a></small></p>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2013/03/badam-payasam-600x408.jpg"/><br />
		The famous Indian dessert with the richness of almonds<br />		<p>40-45 almonds<br />
2 litres milk<br />
1 1/2 cup sugar<br />
few saffron strands<br />
1 teaspoon cardamom powder<br />
pistachio slivers (for garnishing)<br />
almonds (for garnishing)</p>
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		<title>22 अभक्ष्य पदार्थ &#8211; पार्ट 7</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/blog/22-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f-7</link>
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		<pubDate>Tue, 03 Jun 2025 01:42:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/honey-600x450.jpg"/><br />
				<p><strong>B] 4 महाविगई त्याग</strong></p>
<p><strong>7] मध त्याग</strong></p>
<p>मधुमक्खियाँ स्वयं रहने के लिए घर बनाती हैं, उसे मधुमक्खी का छत्ता कहते हैं । मधुमक्खियाँ पुष्पों पर बैठकर फूलों का रस चूसती हैं । यह रस उनके शरीर में पच जाता है । रस पचने के बाद मधुमक्खियों के शरीर में से त्यागी हुई विष्टा का दुसरा नाम है &#8216;शहद&#8217; । यह विष्टा मधुमक्खियाँ कभी लार स्वरूप में मुख से भी बहाती है । यह पदार्थ इतना मीठा और चिकना होता है कि दूसरे असंख्य कीड़े उसमें पैदा हो जाते हैं । शहद पाने के लिए जब मधपूड़े को गिराया जाता है और जब उसे पूरा निचोड़कर शहद छाननें में आता है तब उसके साथ-साथ अंदर पड़े हुए सैकड़ों सफेद कीड़े और मधुमक्खियों के अंडे और छोटे-छोटे बच्चे भी निचोड़ दिये जाते हैं। उसमें पडी हुई विष्टा का रस भी शहद के साथ निचोड़ा जाता है। कीड़े, अंडे, बच्चे, लार और विष्टा के संयोग से सर्जित शहद को कौन समझदार इन्सान खाने के लिए तैयार होगा ? ऐसा वेधक प्रश्न योगशास्त्र में कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्रसूरिजी महाराज ने पूछा है। &#8220;अरे ! मानव के मुंह से निकली लार को कोई चाटने के लिये तैयार नही होता है तो मधुमक्खी जैसे क्षुद्र जंतु की लार चाटने कौन तैयार होगा?&#8217;</p>
<p id="bte_opp"><small>Republished by  <a href="http://www.blogtrafficexchange.com/old-post-promoter/">Blog Post Promoter</a></small></p>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/honey-600x450.jpg"/><br />
				<p><strong>B] 4 महाविगई त्याग</strong></p>
<p><strong>7] मध त्याग</strong></p>
<p>मधुमक्खियाँ स्वयं रहने के लिए घर बनाती हैं, उसे मधुमक्खी का छत्ता कहते हैं । मधुमक्खियाँ पुष्पों पर बैठकर फूलों का रस चूसती हैं । यह रस उनके शरीर में पच जाता है । रस पचने के बाद मधुमक्खियों के शरीर में से त्यागी हुई विष्टा का दुसरा नाम है &#8216;शहद&#8217; । यह विष्टा मधुमक्खियाँ कभी लार स्वरूप में मुख से भी बहाती है । यह पदार्थ इतना मीठा और चिकना होता है कि दूसरे असंख्य कीड़े उसमें पैदा हो जाते हैं । शहद पाने के लिए जब मधपूड़े को गिराया जाता है और जब उसे पूरा निचोड़कर शहद छाननें में आता है तब उसके साथ-साथ अंदर पड़े हुए सैकड़ों सफेद कीड़े और मधुमक्खियों के अंडे और छोटे-छोटे बच्चे भी निचोड़ दिये जाते हैं। उसमें पडी हुई विष्टा का रस भी शहद के साथ निचोड़ा जाता है। कीड़े, अंडे, बच्चे, लार और विष्टा के संयोग से सर्जित शहद को कौन समझदार इन्सान खाने के लिए तैयार होगा ? ऐसा वेधक प्रश्न योगशास्त्र में कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्रसूरिजी महाराज ने पूछा है। &#8220;अरे ! मानव के मुंह से निकली लार को कोई चाटने के लिये तैयार नही होता है तो मधुमक्खी जैसे क्षुद्र जंतु की लार चाटने कौन तैयार होगा?&#8217;</p>
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		<title>साग के ज्यादा प्रचार का कारण</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Jun 2025 13:25:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/vegetables-600x450.jpg"/><br />
				<p>परदेश में स्थूलता का प्रमाण धीरे &#8211; धीरे बढ़ता जा रहा है । मोटापे ने ऐसा गंभीर स्वरुप पकड़ा है कि चिकित्सक चिंता में पड़ गये हैं, कारण कि अनेक आधुनिक रोगों का जन्मदाता मोटापा है और मोटापा कम करने के लिये आधुनिक विज्ञान ने एक हि सूत्र जगत को दिया है, &#8216;कम केलरीवाला खाना खाओ और रफेज का प्रमाण बढाओं&#8217; ।<br />
आधुनिक आहारशास्त्र साग की इतनी तरफदारी क्यों करता है? उसके तीन कारण है : -<br />
1. साग में रफेज का प्रमाण खूब है ।<br />
2. साग में खूब कम केलरी मिलती है ।<br />
3. साग में विटामीन्स और क्षार अच्छे प्रमाण में है । अब इस मुद्दे पर क्रम से चर्चा करेंगे । जब कोई भी प्रजा खूद के खुराक की त्रुटी का अभ्यास करने बैठे तब उसकी नजर के समक्ष खूद का आहार ही होता है । इसलिये स्वाभाविक तरीके से उन्हे उनके आहार में साग का उपयोग नहींवत् दिखा और यह झूठ भी नही है कारण कि वहाँ प्रोटीन, फेट और कार्बोहाइड़ेट भरपूर प्रमाण में खाने में आता है । सिर्फ साग की कमी है । मांस, मच्छी, अंडा, मैंदा की ब्रेड, चीज, फुट ज्यूस, दूध &#8216;वगैरह में रफेज बिल्कुल नहीं होता। इसलिये उसकी पूर्ति के लिये उनकी नजर साग ऊपर पडी । अत्याधिक प्रोटीन और केलरी से पीडाती प्रजा साग की शरण ले यह स्वाभाविक है। इसलिये साग पाश्चात्य लोगों के लिये आदर्श खुराख कह सकते हैं।</p>
<p><strong>हमारे खुराक की खामी :</strong><br />
1. अपनी प्रजा की बात करें तो अपने खुराक में सर्व प्रथम कमी है की बड़े हिस्से में प्रजा को पेट भरकर खाना ही नहीं मिलता | पोषण के कमी की बात तो बाद में लेकिन पूरी केलरी भी नहीं मिलती |<br />
2. दूसरी बड़ी खामी है प्रोटीन के अभाव की | आज हिंदुस्तान में अगर छोटे बच्चो से पूछने में आये की अपनी खुराक में क्या कमी है? तो छोटा बालक भी तुरंत कहेगा की &#8216;प्रोटीन की&#8217; |<br />
3. अपना आहार मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट प्रधान कर रहा है | गेहूं, चावल, ज्वारी, बाजरी, मक्का वगैरह धान्य कार्बोहाइड्रेट खाद्य कहलातें हैं| साग का समावेश भी कार्बोहाइड्रेट में करना हो तो कर सकते हैं परंतु बहुत कम प्रमाण में है| साग मे न तो प्रोटीन है न फेट|<br />
यहाँ यह याद रखना आवश्यक है की कार्बोहाइड्रेट के अधिक उपयोग से (और प्रोटीन के अभाव से ) ही स्थूलता, डायबिटीस जैसे रोग उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं| स्थूलता बढ़ने से हृदयरोग, ब्लडप्रेशर, आर्थराईटिस, स्ट्रोक, सर्दी और कफ के विकार तथा केंसर भी होता है|<br />
4. शाकाहारी को चरबी के लिए घी, तेल, मख्खन ही आधार है, जबकि मांसाहारी लोगों को मांस, मछली, अंडे में से चरबी मिल जाती हैं|</p>
<p><strong>साग के पक्ष में कुछ मुद्दे :</strong><br />
1. अधिक प्रमाण में रफ्फेज<br />
2. खूब कम केलरी<br />
3. वीटामींस और क्षार का प्रमाण</p>
<p><strong>1. साग में रफ्फेज का प्रमाण :</strong> शाक के रफ्फेज के लिये इतना अधिक प्रचार करने में आया है की मानो शाक के अलावा दूसरे किसी खाद्य पदार्थों में रफ्फेज है ही नहीं | जबकि इन्ही लोगों के द्वारा जिन द्रव्यों में फाईबर है उनकी जो लिस्ट दी गयी है, उसमें साक का उल्लेख ही नहीं है| कंदमूल और भाजियों का उल्लेख हैं| उनके मातानुसार अधिक प्रमाण में फाईबर हो ऐसे द्रव्यों की यादी निम्न लिखित है : गेहूं, तथा अन्य अनाज, सभी प्रकार के कठोल धान्य, कंदमूल, भाजी, फल| परंतु हम जब साक खाते हैं तब ये दोनों वीटामिन उसमें नहीं होते | कारण की विटामिन &#8216;सी&#8217; गरमी से तुरंत ही नष्ट हो जाता हैं| जबकि विटामिन &#8216;ए&#8217; साग बनाते वक्त शाक को बार-बार हिलाने से नष्ट हो जाता है, जिसे अंग्रेजी में ओक्सिदेशन (Oxidation) कहते है| जिस बर्तन में साग बनाते हैं उसका ढक्कन बार-बार खोलने से भी विटामिन &#8216;ए&#8217; का नाश होता है, रहा सिर्फ थोड़ा क्षार | साग को समारकर पानी में धोने और बाफने में थोड़ा क्षार नष्ट हो जाता है| साग को छीलने से भी बहुत सारा क्षार छाल के साथ निकल जाता है| इसलिए जब हम साग खाते है तब उसमें विटामिन्स नहीं होता मात्र थोडा बहुत क्षार होता हैं|</p>
<p><strong>तो फिर साग में रहा क्या? किसके लिए खाए?</strong><br />
साग में आहार के तीन मुख्य घटकों (प्रोटीन, चर्बी, कार्बोहाइड्रेट) में से एक भी नहीं, नहीं विटामिन्स, रहा थोडा बहुत क्षार और फाईबर |फाईबर भी अनाज की अपेक्षा में बहुत कम है| फाईबर एक ऐसी चीज़ हैं जिसका शरीर में पाचन हो नहीं सकता|</p>
<p><strong>Times of India</strong> में एक लेख आया था -<br />
<strong>The Importance of Eating Fibre</strong><br />
&#8220;Although fibre plays an important role in the digestive system, it is itself indigestible. There is relatively little scientifc evidence that fibre is useful in treating or in lowering the risk of developing other digestive system disorders.<br />
A controversial claim made about fibre is that it lowers the risk of cancer of the colon.&#8221;</p>
<p>अर्थात पाचनतंत्र में फाइबर महत्त्वपूर्ण हिस्सा रखता है| यह याद रखना जरूरी है कि फाइबर स्वयं बिलकुल पचनेवाला पदार्थ नहीं है| पाचनतंत्र के रोगों की सारसंभाल में फाइबर है, ऐसा विज्ञानं ने अभी तक पुख्ता पुरावा नहीं दिया है|</p>
<p>फाइबर अंतड़ियो के कैंसर को मिटाने के लिए उपयोगी है, यह बात भी आज तक विवादस्पद ही रही है| बर्कीट नाम के एक ब्रिटिश डॉ. ने अफ्रीका में बीस साल तक इसपर संशोधन किया और फिर घोषणा की कि ब्रिटेन और अमेरिका में हृदयरोग, गोल्स्तों, डायबिटीज, अंतड़ियो का केंसर जैसे उपद्रव जो ज्यादा प्रमाण में होते है उसका अफ्रीका में लाब्भाग अभाव था, उसका कारण फाइबर बताया था और उसके बाद फाइबर की महत्ता खूब बढ़ गई है| परंतु यहाँ डॉ. इस दावे के लिए बहुत शंकाशील थे| उन्होंने कहा था कि ये तो युगानुयोग (Circumstantial evidence) है, यह साबिती (Proof) नहीं है| इसलिए फाइबर -फाइबर की जो बात फैलाने में आई है वह स्वयं विवादस्पद (controversial) है| परंतु दूसरा कोई कारण खोज नही सकने के कारण लगभग सभी ने यह स्वीकार लिया है|</p>
<p>यहाँ इतना याद रखना कि में फाइबर के विरुद्ध नहीं परंतु साग के फाइबर के विरुद्ध हूँ| क्योंकि साग के फाइबर पच सके ऐसे नहीं है, जब की अनाज, कठोल में रहे फाइबर पच सकते है|</p>
<p>फाइबर का वैज्ञानिकों ने एक दूसरा नाम दिया है :- अपचनीय कार्बोहायड्रेट (Unavailable Carbohydrate). Food and the Principles of Dietics में लेखक लिखते है कि The Value of these unavailable carbohydrate or roughage in diet has been and still is overrated. Vegetables contain large amount os cellulose. However no enzymes capable of hydrolyzing cellulose are secretes by the human digestive tract. Consequently cellulose cannot be considered to be a food for the human being, though it can be utilized by some lower animals.</p>
<p>अर्थात कार्बोहायड्रेट के दो विभाग है| &#8216;अवेलेबल&#8217; अर्थात सुपाच्य और &#8216;अनअवेलेबल&#8217; अर्थात अपाच्य| इस अपाच्य कार्बोहायड्रेट के रुफ्फेज को विज्ञान और वैद्कीय जगत ने ज्यादा महत्व दिया है| साग में विपुल प्रमाण में विपुल प्रमाण में सेल्यूलोज रहता है परंतु अंतड़ियो या जठर का कोई भी एन्जाइम्स इसे पचा नहीं सकता और इसलिए इसे मानव के लिए नहीं बल्कि जानवरों के लिए खुराक कहना ज्यादा योग्य है|</p>
<p><strong> Food and the Principles of Dietics</strong> में लेखक लिखते है की, &#8216;Any regime which utilizes large amounts of Roughage or Purgatives will entail :<br />
(i) loss of nutrient material to the body<br />
(ii) the passage of unabsorbed proteins, fat and carbohydrates into the large intestine.</p>
<p>अर्थात जो भी चिकित्सापद्धति ज्यादा प्रमाण में रुफ्फेज या रेचक द्रव्यों का उपयोग करती है, तो उससे शरीर को पोषक तत्त्व नहीं नहीं मिलते तथा प्रोटीन, फेट और कार्बोहायड्रेट का शोषण हुए बगैर ही बाहर निकल जाता है|</p>
<p>यदि साग में एक भी तत्त्व न हो, उसका पाचन शक्य न हो, यदि साग नि:खुराक हो तो वह शरीर के लिए कोई भी तरीके से उपयोगी होने की बात तो दूर रही बल्कि अनेक नए रोग उत्पन्न करने की शक्ति धारण करते हैं, ऐसा कहे तो अतिशयोक्ति नहीं| कूचा नहीं तो उत्पन्न हुए रोगो को वह मिटने नहीं देते| ऐसी नि:सत्व खुराक शरीर में डालने की क्या जरूरत है?</p>
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			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/vegetables-600x450.jpg"/><br />
				<p>परदेश में स्थूलता का प्रमाण धीरे &#8211; धीरे बढ़ता जा रहा है । मोटापे ने ऐसा गंभीर स्वरुप पकड़ा है कि चिकित्सक चिंता में पड़ गये हैं, कारण कि अनेक आधुनिक रोगों का जन्मदाता मोटापा है और मोटापा कम करने के लिये आधुनिक विज्ञान ने एक हि सूत्र जगत को दिया है, &#8216;कम केलरीवाला खाना खाओ और रफेज का प्रमाण बढाओं&#8217; ।<br />
आधुनिक आहारशास्त्र साग की इतनी तरफदारी क्यों करता है? उसके तीन कारण है : -<br />
1. साग में रफेज का प्रमाण खूब है ।<br />
2. साग में खूब कम केलरी मिलती है ।<br />
3. साग में विटामीन्स और क्षार अच्छे प्रमाण में है । अब इस मुद्दे पर क्रम से चर्चा करेंगे । जब कोई भी प्रजा खूद के खुराक की त्रुटी का अभ्यास करने बैठे तब उसकी नजर के समक्ष खूद का आहार ही होता है । इसलिये स्वाभाविक तरीके से उन्हे उनके आहार में साग का उपयोग नहींवत् दिखा और यह झूठ भी नही है कारण कि वहाँ प्रोटीन, फेट और कार्बोहाइड़ेट भरपूर प्रमाण में खाने में आता है । सिर्फ साग की कमी है । मांस, मच्छी, अंडा, मैंदा की ब्रेड, चीज, फुट ज्यूस, दूध &#8216;वगैरह में रफेज बिल्कुल नहीं होता। इसलिये उसकी पूर्ति के लिये उनकी नजर साग ऊपर पडी । अत्याधिक प्रोटीन और केलरी से पीडाती प्रजा साग की शरण ले यह स्वाभाविक है। इसलिये साग पाश्चात्य लोगों के लिये आदर्श खुराख कह सकते हैं।</p>
<p><strong>हमारे खुराक की खामी :</strong><br />
1. अपनी प्रजा की बात करें तो अपने खुराक में सर्व प्रथम कमी है की बड़े हिस्से में प्रजा को पेट भरकर खाना ही नहीं मिलता | पोषण के कमी की बात तो बाद में लेकिन पूरी केलरी भी नहीं मिलती |<br />
2. दूसरी बड़ी खामी है प्रोटीन के अभाव की | आज हिंदुस्तान में अगर छोटे बच्चो से पूछने में आये की अपनी खुराक में क्या कमी है? तो छोटा बालक भी तुरंत कहेगा की &#8216;प्रोटीन की&#8217; |<br />
3. अपना आहार मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट प्रधान कर रहा है | गेहूं, चावल, ज्वारी, बाजरी, मक्का वगैरह धान्य कार्बोहाइड्रेट खाद्य कहलातें हैं| साग का समावेश भी कार्बोहाइड्रेट में करना हो तो कर सकते हैं परंतु बहुत कम प्रमाण में है| साग मे न तो प्रोटीन है न फेट|<br />
यहाँ यह याद रखना आवश्यक है की कार्बोहाइड्रेट के अधिक उपयोग से (और प्रोटीन के अभाव से ) ही स्थूलता, डायबिटीस जैसे रोग उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं| स्थूलता बढ़ने से हृदयरोग, ब्लडप्रेशर, आर्थराईटिस, स्ट्रोक, सर्दी और कफ के विकार तथा केंसर भी होता है|<br />
4. शाकाहारी को चरबी के लिए घी, तेल, मख्खन ही आधार है, जबकि मांसाहारी लोगों को मांस, मछली, अंडे में से चरबी मिल जाती हैं|</p>
<p><strong>साग के पक्ष में कुछ मुद्दे :</strong><br />
1. अधिक प्रमाण में रफ्फेज<br />
2. खूब कम केलरी<br />
3. वीटामींस और क्षार का प्रमाण</p>
<p><strong>1. साग में रफ्फेज का प्रमाण :</strong> शाक के रफ्फेज के लिये इतना अधिक प्रचार करने में आया है की मानो शाक के अलावा दूसरे किसी खाद्य पदार्थों में रफ्फेज है ही नहीं | जबकि इन्ही लोगों के द्वारा जिन द्रव्यों में फाईबर है उनकी जो लिस्ट दी गयी है, उसमें साक का उल्लेख ही नहीं है| कंदमूल और भाजियों का उल्लेख हैं| उनके मातानुसार अधिक प्रमाण में फाईबर हो ऐसे द्रव्यों की यादी निम्न लिखित है : गेहूं, तथा अन्य अनाज, सभी प्रकार के कठोल धान्य, कंदमूल, भाजी, फल| परंतु हम जब साक खाते हैं तब ये दोनों वीटामिन उसमें नहीं होते | कारण की विटामिन &#8216;सी&#8217; गरमी से तुरंत ही नष्ट हो जाता हैं| जबकि विटामिन &#8216;ए&#8217; साग बनाते वक्त शाक को बार-बार हिलाने से नष्ट हो जाता है, जिसे अंग्रेजी में ओक्सिदेशन (Oxidation) कहते है| जिस बर्तन में साग बनाते हैं उसका ढक्कन बार-बार खोलने से भी विटामिन &#8216;ए&#8217; का नाश होता है, रहा सिर्फ थोड़ा क्षार | साग को समारकर पानी में धोने और बाफने में थोड़ा क्षार नष्ट हो जाता है| साग को छीलने से भी बहुत सारा क्षार छाल के साथ निकल जाता है| इसलिए जब हम साग खाते है तब उसमें विटामिन्स नहीं होता मात्र थोडा बहुत क्षार होता हैं|</p>
<p><strong>तो फिर साग में रहा क्या? किसके लिए खाए?</strong><br />
साग में आहार के तीन मुख्य घटकों (प्रोटीन, चर्बी, कार्बोहाइड्रेट) में से एक भी नहीं, नहीं विटामिन्स, रहा थोडा बहुत क्षार और फाईबर |फाईबर भी अनाज की अपेक्षा में बहुत कम है| फाईबर एक ऐसी चीज़ हैं जिसका शरीर में पाचन हो नहीं सकता|</p>
<p><strong>Times of India</strong> में एक लेख आया था -<br />
<strong>The Importance of Eating Fibre</strong><br />
&#8220;Although fibre plays an important role in the digestive system, it is itself indigestible. There is relatively little scientifc evidence that fibre is useful in treating or in lowering the risk of developing other digestive system disorders.<br />
A controversial claim made about fibre is that it lowers the risk of cancer of the colon.&#8221;</p>
<p>अर्थात पाचनतंत्र में फाइबर महत्त्वपूर्ण हिस्सा रखता है| यह याद रखना जरूरी है कि फाइबर स्वयं बिलकुल पचनेवाला पदार्थ नहीं है| पाचनतंत्र के रोगों की सारसंभाल में फाइबर है, ऐसा विज्ञानं ने अभी तक पुख्ता पुरावा नहीं दिया है|</p>
<p>फाइबर अंतड़ियो के कैंसर को मिटाने के लिए उपयोगी है, यह बात भी आज तक विवादस्पद ही रही है| बर्कीट नाम के एक ब्रिटिश डॉ. ने अफ्रीका में बीस साल तक इसपर संशोधन किया और फिर घोषणा की कि ब्रिटेन और अमेरिका में हृदयरोग, गोल्स्तों, डायबिटीज, अंतड़ियो का केंसर जैसे उपद्रव जो ज्यादा प्रमाण में होते है उसका अफ्रीका में लाब्भाग अभाव था, उसका कारण फाइबर बताया था और उसके बाद फाइबर की महत्ता खूब बढ़ गई है| परंतु यहाँ डॉ. इस दावे के लिए बहुत शंकाशील थे| उन्होंने कहा था कि ये तो युगानुयोग (Circumstantial evidence) है, यह साबिती (Proof) नहीं है| इसलिए फाइबर -फाइबर की जो बात फैलाने में आई है वह स्वयं विवादस्पद (controversial) है| परंतु दूसरा कोई कारण खोज नही सकने के कारण लगभग सभी ने यह स्वीकार लिया है|</p>
<p>यहाँ इतना याद रखना कि में फाइबर के विरुद्ध नहीं परंतु साग के फाइबर के विरुद्ध हूँ| क्योंकि साग के फाइबर पच सके ऐसे नहीं है, जब की अनाज, कठोल में रहे फाइबर पच सकते है|</p>
<p>फाइबर का वैज्ञानिकों ने एक दूसरा नाम दिया है :- अपचनीय कार्बोहायड्रेट (Unavailable Carbohydrate). Food and the Principles of Dietics में लेखक लिखते है कि The Value of these unavailable carbohydrate or roughage in diet has been and still is overrated. Vegetables contain large amount os cellulose. However no enzymes capable of hydrolyzing cellulose are secretes by the human digestive tract. Consequently cellulose cannot be considered to be a food for the human being, though it can be utilized by some lower animals.</p>
<p>अर्थात कार्बोहायड्रेट के दो विभाग है| &#8216;अवेलेबल&#8217; अर्थात सुपाच्य और &#8216;अनअवेलेबल&#8217; अर्थात अपाच्य| इस अपाच्य कार्बोहायड्रेट के रुफ्फेज को विज्ञान और वैद्कीय जगत ने ज्यादा महत्व दिया है| साग में विपुल प्रमाण में विपुल प्रमाण में सेल्यूलोज रहता है परंतु अंतड़ियो या जठर का कोई भी एन्जाइम्स इसे पचा नहीं सकता और इसलिए इसे मानव के लिए नहीं बल्कि जानवरों के लिए खुराक कहना ज्यादा योग्य है|</p>
<p><strong> Food and the Principles of Dietics</strong> में लेखक लिखते है की, &#8216;Any regime which utilizes large amounts of Roughage or Purgatives will entail :<br />
(i) loss of nutrient material to the body<br />
(ii) the passage of unabsorbed proteins, fat and carbohydrates into the large intestine.</p>
<p>अर्थात जो भी चिकित्सापद्धति ज्यादा प्रमाण में रुफ्फेज या रेचक द्रव्यों का उपयोग करती है, तो उससे शरीर को पोषक तत्त्व नहीं नहीं मिलते तथा प्रोटीन, फेट और कार्बोहायड्रेट का शोषण हुए बगैर ही बाहर निकल जाता है|</p>
<p>यदि साग में एक भी तत्त्व न हो, उसका पाचन शक्य न हो, यदि साग नि:खुराक हो तो वह शरीर के लिए कोई भी तरीके से उपयोगी होने की बात तो दूर रही बल्कि अनेक नए रोग उत्पन्न करने की शक्ति धारण करते हैं, ऐसा कहे तो अतिशयोक्ति नहीं| कूचा नहीं तो उत्पन्न हुए रोगो को वह मिटने नहीं देते| ऐसी नि:सत्व खुराक शरीर में डालने की क्या जरूरत है?</p>
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		<title>आज के नवजवानों की दशा</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Jun 2025 01:16:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/navjavano.jpg"/><br />
				<p>जवानो में रोगों का ज्यादा होने का कारण प्रज्ञापराध हैं । फ्रेन्ड सर्कल के साथ रेस्टॉरेंट ओर ठेलों पर पावभाजी, वड़ापाव, भेलपुरी, पानीपुरी, मलाई कोफ्ता, पनीर पकोड़ी, छोलेपुरी, छोलेभटुरे, पीझा, हेम्बर्गर, सेन्डवीच, उत्तपा, कोकाकोला, थम्सअप, गोल्डस्पॉट, आइस्क्रिम पेट में डालते है, जो जड़ से आरोग्य का नाश करते हैं। आज की बिगड़ी हुई युवापीढ़ी की इतनी विषम परिस्थिति है कि बिचारों को ‘खाने की खबर नहीं और अभिमान का पार नहीं। गांधीजी कहते थे कि, ‘मोहल्ले के भूगोल का ख्याल नहीं और इंग्लैंड की नदीयों, गाँवो और शहरों के नाम याद कर रहे हैं ।&#8217; शरीर की संरचना पता नहीं, अंदर रही सात धातुओं और वात, पित्त, कफ का प्रकोप किससे होता है और ये शांत किससे होता है, यह आज की पीढ़ी को मालूम नहीं उघैर डेरायटी खाये बिना रहते नहीं । बस! कैसे भी करके वर्चस्व दिखाना हैं ।</p>
<p>कई लल्लुओं के पेट में गैस हो, ढमढोल बजता हो तो भी भाई-बंधु, दोस्त-यारों के बीच बेइज्जत न होना पड़े इसलिये जो सभी खाते हैं वह नवजवान भी खा लेता हैं । पेट की ऐसी की तैसी !</p>
<p>आयुर्वेद का नियम है कि भूख लगे बिना खाना नहीं । भूख बिना जो खाते हैं उससे आमरस तैयार होता है । यह आमरस सर्वरोगों का पितामह है । जिसे आज के डॉक्टर ईन्डायजेशन कहते हैं । इस एक महारोग से व्यक्ति की प्रकृति अनुरुप किसी को सद, किसी को बुखार, किसी को खांसी ऐसे भिन्न-भिन्न हजारों रोग होते हैं परन्तु सभी रोगों का जन्मदाता आम है । आम का जन्मदाता टेस्टफुल, स्वादिष्ट, मॉर्डन, न्यु व्हेरायटी वाला आहार है और इस आहार को पेट में डालने की गुस्ताखी करने वाला दोष &#8216;प्रज्ञापराध&#8217; है ।</p>
<p>पूर्व में इस देश में अपने घरों के संस्कार ऐसे रहते थे कि अमुक चीजे कुल परंपरा में कभी भी कोई व्यक्ति खाते नहीं थे । इसलिये प्रज्ञापराध होने की शक्यता ही नहीं थी परंतु आज कुलाचार के नियमों का कहीं कोइ ठिकाना नहीं है।</p>
<p>मैं 1६ वर्ष तक गृहस्थावस्था में रहा, ४० वर्ष के दीक्षा पर्याय में मैं तुम्हे गैरेंटी के साथ कह सकता हुँ कि मैंने जिंदगी में कभी भी कंदमूल नहीं खाया । इस काया में किसी भी कंदमूल का प्रवेश हुआ नहीं । इसमें उपदेश की जरुरत नही थी परंतु जैन कुल मे जन्म होने के साथ ही कंदमूल का त्याग हो जाता । हिन्दु कुल में जन्म लेने मात्र से मांसाहार का त्याग हो जाता है । इतनी सुंदर व्यवस्था आयोजित थी । डाइ तैयार थी इसलिए माल एकसमान ही बहार आता था । कोई भी संतान का जन्म होता था तो वह कंदमूल, मांसाहार का त्याग की डाई में से निकलता था इसीलिए तो जीवन में कभी भी इन चीजों के सामने नज़र तक नहीं करता । आज इन डाई को खत्म कर दी गई है । बालक के जन्म के पहले ही माँ-बाप आमलेट, कंदमूल खाकर खूद के पेट को भर चुके है तो फिर उनके संतान के पास से क्या अपेक्षा रखनी ?</p>
<p>साफ शब्दों में कहना पड़ेगा कि आर्यदेश की आहार-चर्या टूट गई है । एक भी नियम आज सलामत रहा नहीं. इसका यह क्ट्र परिणाम है कि कोई भी निरोगी खोजने से हाथ लगेगा नहीं ।</p>
<p>यह हमारा देश था जहां स्नान किए बिना रसोइघर में प्रवेश करना मना था । जितनी पवित्रता भगवान के मंदिर में पलती उतनी पवित्रता रसोई घर में पाली जाती थी । M.C. वाली महिला को रसोई घर में प्रवेश की मनाई थी । उनके खाना खाने बर्तन अलग रहते थे । खाना खाने के बाद उसे साफ भी अलग से करते थे, पानी छाने बिना उपयोग में नहीं लेते थे । अनाज को जीव-जन्तु की जयणा किए बिना उपयोग में नहीं लेते थे । रसोई का काम माता, बहन और पत्नी करती थी परन्तु परोसने का काम सदा माता ही करती थी। मॉं के हाथों महिमा थी। कहते है क ज़हर खाना पड़े तो मॉं के हाथों से खाना। खाने के पहले परमात्मा का नामस्मरण करते थे । पूज्य साधुमगवंतो को भिक्षादान किया जाता था । खाते वक्त बिलकुल मौन रखते थे । ज्यादातर चूले पर चढ़ी ताजी रसोई ही खाने में आती थी, ऐसे बहुत जरूरी कई नियम थे । इसमें से आज एक भी नियम सलामत रहा नहीं ।</p>
<p>आज यह कैसा काल आने लगा कि जो आहारशुद्धि जैनकुल में जन्म लेने मात्र से घर में सीखने मिलती थी, उस आहारशुद्धि को आज हमें आपको प्रवचनों में सिखानी पड़ती है ।</p>
<p id="bte_opp"><small>Republished by  <a href="http://www.blogtrafficexchange.com/old-post-promoter/">Blog Post Promoter</a></small></p>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/navjavano.jpg"/><br />
				<p>जवानो में रोगों का ज्यादा होने का कारण प्रज्ञापराध हैं । फ्रेन्ड सर्कल के साथ रेस्टॉरेंट ओर ठेलों पर पावभाजी, वड़ापाव, भेलपुरी, पानीपुरी, मलाई कोफ्ता, पनीर पकोड़ी, छोलेपुरी, छोलेभटुरे, पीझा, हेम्बर्गर, सेन्डवीच, उत्तपा, कोकाकोला, थम्सअप, गोल्डस्पॉट, आइस्क्रिम पेट में डालते है, जो जड़ से आरोग्य का नाश करते हैं। आज की बिगड़ी हुई युवापीढ़ी की इतनी विषम परिस्थिति है कि बिचारों को ‘खाने की खबर नहीं और अभिमान का पार नहीं। गांधीजी कहते थे कि, ‘मोहल्ले के भूगोल का ख्याल नहीं और इंग्लैंड की नदीयों, गाँवो और शहरों के नाम याद कर रहे हैं ।&#8217; शरीर की संरचना पता नहीं, अंदर रही सात धातुओं और वात, पित्त, कफ का प्रकोप किससे होता है और ये शांत किससे होता है, यह आज की पीढ़ी को मालूम नहीं उघैर डेरायटी खाये बिना रहते नहीं । बस! कैसे भी करके वर्चस्व दिखाना हैं ।</p>
<p>कई लल्लुओं के पेट में गैस हो, ढमढोल बजता हो तो भी भाई-बंधु, दोस्त-यारों के बीच बेइज्जत न होना पड़े इसलिये जो सभी खाते हैं वह नवजवान भी खा लेता हैं । पेट की ऐसी की तैसी !</p>
<p>आयुर्वेद का नियम है कि भूख लगे बिना खाना नहीं । भूख बिना जो खाते हैं उससे आमरस तैयार होता है । यह आमरस सर्वरोगों का पितामह है । जिसे आज के डॉक्टर ईन्डायजेशन कहते हैं । इस एक महारोग से व्यक्ति की प्रकृति अनुरुप किसी को सद, किसी को बुखार, किसी को खांसी ऐसे भिन्न-भिन्न हजारों रोग होते हैं परन्तु सभी रोगों का जन्मदाता आम है । आम का जन्मदाता टेस्टफुल, स्वादिष्ट, मॉर्डन, न्यु व्हेरायटी वाला आहार है और इस आहार को पेट में डालने की गुस्ताखी करने वाला दोष &#8216;प्रज्ञापराध&#8217; है ।</p>
<p>पूर्व में इस देश में अपने घरों के संस्कार ऐसे रहते थे कि अमुक चीजे कुल परंपरा में कभी भी कोई व्यक्ति खाते नहीं थे । इसलिये प्रज्ञापराध होने की शक्यता ही नहीं थी परंतु आज कुलाचार के नियमों का कहीं कोइ ठिकाना नहीं है।</p>
<p>मैं 1६ वर्ष तक गृहस्थावस्था में रहा, ४० वर्ष के दीक्षा पर्याय में मैं तुम्हे गैरेंटी के साथ कह सकता हुँ कि मैंने जिंदगी में कभी भी कंदमूल नहीं खाया । इस काया में किसी भी कंदमूल का प्रवेश हुआ नहीं । इसमें उपदेश की जरुरत नही थी परंतु जैन कुल मे जन्म होने के साथ ही कंदमूल का त्याग हो जाता । हिन्दु कुल में जन्म लेने मात्र से मांसाहार का त्याग हो जाता है । इतनी सुंदर व्यवस्था आयोजित थी । डाइ तैयार थी इसलिए माल एकसमान ही बहार आता था । कोई भी संतान का जन्म होता था तो वह कंदमूल, मांसाहार का त्याग की डाई में से निकलता था इसीलिए तो जीवन में कभी भी इन चीजों के सामने नज़र तक नहीं करता । आज इन डाई को खत्म कर दी गई है । बालक के जन्म के पहले ही माँ-बाप आमलेट, कंदमूल खाकर खूद के पेट को भर चुके है तो फिर उनके संतान के पास से क्या अपेक्षा रखनी ?</p>
<p>साफ शब्दों में कहना पड़ेगा कि आर्यदेश की आहार-चर्या टूट गई है । एक भी नियम आज सलामत रहा नहीं. इसका यह क्ट्र परिणाम है कि कोई भी निरोगी खोजने से हाथ लगेगा नहीं ।</p>
<p>यह हमारा देश था जहां स्नान किए बिना रसोइघर में प्रवेश करना मना था । जितनी पवित्रता भगवान के मंदिर में पलती उतनी पवित्रता रसोई घर में पाली जाती थी । M.C. वाली महिला को रसोई घर में प्रवेश की मनाई थी । उनके खाना खाने बर्तन अलग रहते थे । खाना खाने के बाद उसे साफ भी अलग से करते थे, पानी छाने बिना उपयोग में नहीं लेते थे । अनाज को जीव-जन्तु की जयणा किए बिना उपयोग में नहीं लेते थे । रसोई का काम माता, बहन और पत्नी करती थी परन्तु परोसने का काम सदा माता ही करती थी। मॉं के हाथों महिमा थी। कहते है क ज़हर खाना पड़े तो मॉं के हाथों से खाना। खाने के पहले परमात्मा का नामस्मरण करते थे । पूज्य साधुमगवंतो को भिक्षादान किया जाता था । खाते वक्त बिलकुल मौन रखते थे । ज्यादातर चूले पर चढ़ी ताजी रसोई ही खाने में आती थी, ऐसे बहुत जरूरी कई नियम थे । इसमें से आज एक भी नियम सलामत रहा नहीं ।</p>
<p>आज यह कैसा काल आने लगा कि जो आहारशुद्धि जैनकुल में जन्म लेने मात्र से घर में सीखने मिलती थी, उस आहारशुद्धि को आज हमें आपको प्रवचनों में सिखानी पड़ती है ।</p>
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		</item>
		<item>
		<title>Cabbage Kofta</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/sabzi/cabbage-kofta</link>
		<comments>https://www.jainrasoi.com/sabzi/cabbage-kofta#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 01 Jun 2025 13:05:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Sabzi]]></category>
		<category><![CDATA[40]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2012/11/cabbage-kofta-600x417.jpg"/><br />
		Fried dumplings made of cabbage give an exotic taste.<br />		<p>*For the Koftas<br />
2 cups cabbage (shredded)<br />
1/4 cup coriander leaves<br />
1/2 cup green gram flour<br />
1/2 teaspoon <a href="https://www.jainrasoi.com/masala/red-chilli-powder" title="Red Chilli Powder">red chilli powder</a><br />
*For the paste<br />
2 teaspoon watermelon seeds (optional)<br />
2 dry red chillies<br />
1 tablespoon coriander leaves<br />
2 tablespoon fresh coconut<br />
*Other Ingredients<br />
1/2 teaspoon cumin seeds<br />
1/4 teaspoon asafoetida<br />
pinch of <a href="https://www.jainrasoi.com/masala/haldi" title="Turmeric Powder">turmeric powder</a><br />
pinch of <a href="https://www.jainrasoi.com/masala/garam-masala" title="Jain Garam Masala">garam masala</a><br />
1/4 teaspoon dry mango powder (amchoor)<br />
1 tablespoon ghee<br />
salt to taste</p>
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		Fried dumplings made of cabbage give an exotic taste.<br />		<p>*For the Koftas<br />
2 cups cabbage (shredded)<br />
1/4 cup coriander leaves<br />
1/2 cup green gram flour<br />
1/2 teaspoon <a href="https://www.jainrasoi.com/masala/red-chilli-powder" title="Red Chilli Powder">red chilli powder</a><br />
*For the paste<br />
2 teaspoon watermelon seeds (optional)<br />
2 dry red chillies<br />
1 tablespoon coriander leaves<br />
2 tablespoon fresh coconut<br />
*Other Ingredients<br />
1/2 teaspoon cumin seeds<br />
1/4 teaspoon asafoetida<br />
pinch of <a href="https://www.jainrasoi.com/masala/haldi" title="Turmeric Powder">turmeric powder</a><br />
pinch of <a href="https://www.jainrasoi.com/masala/garam-masala" title="Jain Garam Masala">garam masala</a><br />
1/4 teaspoon dry mango powder (amchoor)<br />
1 tablespoon ghee<br />
salt to taste</p>
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		</item>
		<item>
		<title>कच्चा पानी, उबला पानी</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/blog/%e0%a4%95%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80</link>
		<comments>https://www.jainrasoi.com/blog/%e0%a4%95%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 01 Jun 2025 00:47:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/water-600x400.jpg"/><br />
				<p>जैनदर्शन ने जो जीवविज्ञान दर्शाया है । उसमें पानी को भी जीव स्वरुप माना गया हैं । आज का विज्ञान पानी में जीव मानता है, पर पानी को जीव नहीं मानता । जैसे वनस्पति स्वयं जीव स्वरुप हैं वैसे ही पानी भी स्वयं जीव स्वरुप है । शाकभाजी समारकर पकाने से जीवरहित बनती है वैसे ही पानी भी उबालने से जीवरहित बनता है ।</p>
<p>कच्चे पानी में हर समय असंख्य जीव अपने आप मरते हैं और अपने आप पैदा होते हैं । पानी को जब तक गरम नहीं करते तब तक ये जनम मरण की साइकल सतत चलती रहती है । पानी को एक बार गरम कर लेने से क्षण-क्षण में जो असंख्य जीवों के जन्म-मरण की श्रेणि चलती है वह स्टॉप हो जाती है । पानी को उबालने में एक बार असंख्य जीवों की हिंसा होती ही है । उसके बदले कच्चा पानी पी ले तो भी शरीर में जाने के बाद उन जीवों की हिंसा होनेवाली ही है । शरीर की गरमी से जीवों को हानि होती है । इसलिये पानी कच्चा पीना या गरम करके पीना दोनों में हिंसा तो होनी ही है । परंन्तु दोनों परिस्थिति मै फर्क इतना है कि सीधे कच्चा पानी पीने से जीवित जीव सीधे मुख में डालने की धृष्टता करनी पडती है । जब कि उबले पानी का पान करते समय मुख में जीवित नहीं परन्तु निर्जीव पदार्थ का प्रवेश होता है ।</p>
<p>कच्चा पानी सीधे मुख में डालना और उबला पानी मुख में डालना दोनों समय मन के परिणाम में फर्क पड़ता है । कच्चा पानी पीते वक्त ये जीव है, ऐसा ख्याल होते हुए भी व्यक्ति क्रूर बनकर पानी को पेट में डालता है । जबकि उबला पानी पीते वक्त व्यक्ति का मन यह समझता हैं कि यह जल निर्जीव है, अचित्त है । मैं मेरे मुख में जीवों को नहीं मारता, जल अचित्त करके फिर मैंने जल का उपयोग किया है । जल में क्षण-क्षण जो जन्म-मरण की साइकल चलती थी वह साइकल जल को एक बार उबाल लेने के बाद नियत समय के लिये स्टॉप हो जाती है । अब जल जब तक अचित्त रहेगा तब तक कोई नई जीवोत्पत्ति नही होगी ।</p>
<p>यह प्रथम बात हुई हिंसा-अहिंसा और अपने चित्त परिणाम की । अब दुसरी बात :- कच्चा पानी आयुर्वेद की दृष्टि से विकारक कहलाता है ।<br />
कच्चा पानी पीने से व्यक्ति के मन में विकारभाव ज्यादा प्रमाण में जाग्रत होते हैं । इसलिये ब्रह्मचर्य के परिपालन के लिये तथा वीर्यरक्षा के लिये भी कच्चा पानी त्याग देना हितकारी हैं ।<br />
तीसरे नंबर पर आज के साइंस ने अभी-अभी वॉटर के तीन विभाग दर्शायें है :-<br />
<strong>1. बेस्ट वॉटर</strong><br />
<strong>2. मीडियम वॉटर</strong><br />
<strong>3. बेड वॉटर</strong></p>
<p><strong>1. बेस्ट वॉटर</strong> : &#8211; उबला हुआ गरम पानी बेस्ट वॉटर हैं । ऐसा गरम पानी पीने से शरीर में कोई रोग नहीं होता, पाचनशक्ति बढ़ती है, जठराग्निने प्रबल बनती है और शरीर के तमाम अवयवों को उर्जा शक्ति प्राप्त होती है । पुरा जपान आज इस तरह से गरमा-गरम पानी पीता है । जैन साधु-साध्वीजीओं को भी इस तरह उबाला हुआ पानी जैसा टेम्परेचर वाला मिला हो वैसा ही काष्ठ के बर्तन में रखना होता है । जब जरुरत पड़े तब ठंडा किए बिना गरम ही पीना होता है । (आज पानी ठंडा करने का रीवाज सर्वत्र व्यापक बन गया है, लेकिन यह योग्य नही|)</p>
<p><strong>2. मीडियम वॉटर</strong> : &#8211; जिस पानी को उबालने के बाद ठंडा करके उपयोग में लेते हैं उसे मीडीयम वॉटर कहते है । यह पानी खास आरोग्यप्रद नही बनता ।</p>
<p><strong>3. बेड वॉटर</strong> : &#8211; जिस पानी को उबालने में नही आता, गरम करने के बजाए फ्रिज में ठंडा करने के लिये रखते हैं । वह जल (या कोल्ड्रींक्स) सबसे कनिष्ठ है । यह जल आरोग्य को हानि पहुँचाता है । आयुर्वेद के अनुसार सर्व रोगों का उत्पत्ति-स्थान पेट हैं । संपूर्ण खुराक को पचाने का काम पेट करता है, पर पेट का सत्यानाश करने का काम ठंडा पानी और ठंडे पेय करते हैं । पेट की प्रबल जठराग्रि कच्ची-पक्की जैसी भी रसोई हो उसे स्वाहा कर देती है परन्तु ठंडे पेय जठराग्नि को स्वाहा करते है। परमात्मा की सचित्तजल त्याग की बात हम मानते नही । लेकिन जब शहरो में चीकनगुनीया, मंकीगुनीया, टोमेटीगुनीया, कोलेरा, प्लेग और पीलीया के वायरस फैल जायें तब टी.वी. पर घोषणा होती हैं कि &#8216;पानी उबालकर पीयो ।&#8217; तब टी. वी. देवता को यस सर! करके उबाला हुआ पानी पीते हैं।</p>
<p><strong>कुछ सावधानियाँ : -</strong><br />
A. उबला हुआ पानी उपयोग मे लानेवालों को एक बात ध्यान में रखनी चाहिये कि पानी गरम नहीं परन्तु उबला हुआ उपयोग में लेना है । गरम करना और उबालना दोनों में फर्क है । चूले पर चढ़ाने के बाद सामान्य गरम करने से अचित्त नहीं होता । जब पानी उबालना हो तब चाय की नरह उसमें तीन उबाल आने चाहिये । प्रथम उबाल उगना है तब पानी सचित्त होता है । दूसरा उबाल आने पर मिश्र सचित्त-अचित्त) होता है और तीसरे उबाल आने पर पानी अचित्त होता है । इसलिये पूरे तीन उबाल आये बिना पानी चूले पर से उतार दे तो वह पानी नही चलता ।</p>
<p>B. उबाला पानी ठंडा करने के लिये परात में खुल्ला पड़ा रहता है । उसमें जीव-जन्तु गिरे तो विराधना होती है, इसलिये उस पर जाली ढांकना जरुरी है । उबलते पानी की परात जमीन पर रखने से भी किसी जीव की विराधना हो सकती है इसलिये पाट पर रखना चाहिये ।</p>
<p>C. तीन उबाल लिये हुए पानी को उतारते और ठंडा करते वक्त पूरा उपयोग रखना चाहिये । जिससे हाथ-पैर जलने या किसी के ऊपर गिरने का प्रसंग न बने ।</p>
<p>D. आकाश में उड़ते जीव तथा अप्काय के जीवों का गिरना संभव होने से उबला पानी कभी भी खुले आकाश के नीचे खुल्ला नहीं रखना । पानी का घडा या तपेली ले जाना हो तो ढांककर ले जाना ।</p>
<p>E. परात में ठंडा किया हुआ पानी ठंडा हुआ कि नहीं यह देखने के लिये सीधी ऊंगली अंदर डालने से नख का मैल पानी में मिलता है जिससे उसमें समूर्च्छिम जीव पैदा होते हैं । इसलिये मध्यमा अंगुली मोड़कर उल्टा करके स्पर्श करना चाहिये । यदि अंगुली पसीने या मैल वाली हो तो धो-पोंछकर फिर अंदर डालें ।</p>
<p>F. ठंडा किया हुआ पानी मटके में भरने से पहले मटके के अन्दर नजर करके पूंजनी से जयणा करनी चाहिये । अन्दर मच्छर वगैरह हो तो हिंसा होनी संभव है ।</p>
<p>G. उबला पानी बढ़ा हो तो सूर्यास्त पूर्व तुरन्त सूख जाए ऐसे तरीके से उसका विसर्जन करना चाहिये । गटर में डाल देना योग्य नहीं है। रोड़ पर, छत-आंगन में जयणा पूर्वक डाल सकते है ।</p>
<p>H. उबला पानी पीनेवाले को प्रवास में जाते वक्त पानी का साधन साथ में रखना चाहिये । कभी तकलिफ हो तो रेल्वे स्टेशन पर से कच्चा पानी छानकर कई लोग किसी भी स्थल पर गरम करवाकर उस पानी को उपयोग में लेते हैं । छुट्टे पच्चक्खानवाले को नींबू का शरबत या त्रिफला का पानी चल सकता है ।</p>
<p>I. राख का पानी, शक्कर का पानी, नींबू का पानी, त्रिफला का पानी दो घड़ी बाद अचित्त होता है । फिर उसका समय गरम पानी की तरह ही निर्धारीत होता है ।</p>
<p>J. उबला पानी ग्लास में पीने के तुरन्त बाद गिलास पोंछ लेना चाहिये । दूसरी बार लेना हो तो ग्लास पोंछे बिना लेना नहीं । झूठे गिलास में से छींटा घड़े में गिरे तो घड़े में असंख्य समूर्च्छिम पंचेन्द्रिय मनुष्य उत्पन्न होते है । इसलिये उपयोग रखना जरुरी है ।</p>
<p>K. उबला हुआ पानी ग्रीष्म में ५ प्रहर, ठंडी में ४ प्रहर और चौमासे में ३ प्रहर अचित्त रहता है । (एक प्रहर याने दिन का चौथाई भाग समझना । 1२ घंटे का दिन हो तो एक प्रहर तीन घंटे का गिनना) चौमासे में तीन प्रहर का काल होने से सबेरे उबाला हुआ पानी दोपहर तीन बजे तक चल सकता है उसके बाद उसका विसर्जन करना पड़ता है । दूसरे काल का पानी दस बजे के बाद चूले से उतारा हो तो सूर्यास्त तक चल सकता है ।</p>
<p>L. जहॉं आयंबिलशाला में पानी उबलता है वहाँ अजयना, हिंसा और बेदरकारी का कोई पार नहीं । सामान्य व्यक्तियों के हाथ में यह काम सौंपने से बहुत बड़ी गड़बड़ चलती है । 1. पानी छाने बिना गरम करते हैं ।<br />
2. पानी गरम किया हुआ यदि बढ़ गया हो तो तपेले में दूसरे दिन तक चूले पर ही पड़ा रहता है । सुबह उसमें बिना छना नया पानी मिलाकर उसे ही गरम कर देते हैं ।<br />
3. चूले का प्रमार्जन नहीं करते ।<br />
4. पानी सूर्योदय पूर्व ही चूले से उतार देते हैं ।<br />
5. पानी के तीन उबाल आये कि नहीं? उसकी राह नही देखते; भाँप निकले न निकले तुरन्त उतार देते हैं ।<br />
6. बड़ी परात में पानी पूरे दिन खुला पड़ा रहता हैं । उसमें धूल और कई जीव-जंतु गिरते है ।<br />
7. पानी उबालने के बर्तन पचास-पचास सालों तक कभी बदलने में नही आते । जब तक नया बर्तन नहीं आता और ये बर्तन टूटते नहीं तब तक उसे उल्टा करके साफ भी नहीं किया जाता ।<br />
8. मच्छरों से भरपूर उपाश्रयों में सबेरा होते ही सब मच्छर घड़े के पेंदे में बैठे रहते हैं । इन घड़ों का प्रमार्जन किये बिना ही पानी भरकर रख देते हैं । ऐसे हजारों प्रकार की अजयनाओं से उबला हुआ यह पानी, उबला हुआ होते हुए भी अनेक प्रदूषणों से प्रदूषित होता है । इस कारण आरोग्यप्रद नहीं हो सकता । इस विषय में ट्रस्टी महोदय, श्रावक-श्राविकाएँ स्वयं जाग्रत बनकर अपना समय दे तो सुधारा हो सकता है । बाकी मजदूर व्यक्ति और रसोइयाँ के लिये तो हॉटल और उपाश्रय एक समान हैं ।<br />
9. यदि श्रावक घर में हि पानी उबालते हो और रोज पीते हो तो साधु-साध्वीजी महाराज को आयंबिल खाता से प्रदूषित-जल ग्रहण नहीं करना पडे । श्रावकों को गोचरी के साथ-साथ पानी का भी लाभ मिलेगा।</p>
<p id="bte_opp"><small>Republished by  <a href="http://www.blogtrafficexchange.com/old-post-promoter/">Blog Post Promoter</a></small></p>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/water-600x400.jpg"/><br />
				<p>जैनदर्शन ने जो जीवविज्ञान दर्शाया है । उसमें पानी को भी जीव स्वरुप माना गया हैं । आज का विज्ञान पानी में जीव मानता है, पर पानी को जीव नहीं मानता । जैसे वनस्पति स्वयं जीव स्वरुप हैं वैसे ही पानी भी स्वयं जीव स्वरुप है । शाकभाजी समारकर पकाने से जीवरहित बनती है वैसे ही पानी भी उबालने से जीवरहित बनता है ।</p>
<p>कच्चे पानी में हर समय असंख्य जीव अपने आप मरते हैं और अपने आप पैदा होते हैं । पानी को जब तक गरम नहीं करते तब तक ये जनम मरण की साइकल सतत चलती रहती है । पानी को एक बार गरम कर लेने से क्षण-क्षण में जो असंख्य जीवों के जन्म-मरण की श्रेणि चलती है वह स्टॉप हो जाती है । पानी को उबालने में एक बार असंख्य जीवों की हिंसा होती ही है । उसके बदले कच्चा पानी पी ले तो भी शरीर में जाने के बाद उन जीवों की हिंसा होनेवाली ही है । शरीर की गरमी से जीवों को हानि होती है । इसलिये पानी कच्चा पीना या गरम करके पीना दोनों में हिंसा तो होनी ही है । परंन्तु दोनों परिस्थिति मै फर्क इतना है कि सीधे कच्चा पानी पीने से जीवित जीव सीधे मुख में डालने की धृष्टता करनी पडती है । जब कि उबले पानी का पान करते समय मुख में जीवित नहीं परन्तु निर्जीव पदार्थ का प्रवेश होता है ।</p>
<p>कच्चा पानी सीधे मुख में डालना और उबला पानी मुख में डालना दोनों समय मन के परिणाम में फर्क पड़ता है । कच्चा पानी पीते वक्त ये जीव है, ऐसा ख्याल होते हुए भी व्यक्ति क्रूर बनकर पानी को पेट में डालता है । जबकि उबला पानी पीते वक्त व्यक्ति का मन यह समझता हैं कि यह जल निर्जीव है, अचित्त है । मैं मेरे मुख में जीवों को नहीं मारता, जल अचित्त करके फिर मैंने जल का उपयोग किया है । जल में क्षण-क्षण जो जन्म-मरण की साइकल चलती थी वह साइकल जल को एक बार उबाल लेने के बाद नियत समय के लिये स्टॉप हो जाती है । अब जल जब तक अचित्त रहेगा तब तक कोई नई जीवोत्पत्ति नही होगी ।</p>
<p>यह प्रथम बात हुई हिंसा-अहिंसा और अपने चित्त परिणाम की । अब दुसरी बात :- कच्चा पानी आयुर्वेद की दृष्टि से विकारक कहलाता है ।<br />
कच्चा पानी पीने से व्यक्ति के मन में विकारभाव ज्यादा प्रमाण में जाग्रत होते हैं । इसलिये ब्रह्मचर्य के परिपालन के लिये तथा वीर्यरक्षा के लिये भी कच्चा पानी त्याग देना हितकारी हैं ।<br />
तीसरे नंबर पर आज के साइंस ने अभी-अभी वॉटर के तीन विभाग दर्शायें है :-<br />
<strong>1. बेस्ट वॉटर</strong><br />
<strong>2. मीडियम वॉटर</strong><br />
<strong>3. बेड वॉटर</strong></p>
<p><strong>1. बेस्ट वॉटर</strong> : &#8211; उबला हुआ गरम पानी बेस्ट वॉटर हैं । ऐसा गरम पानी पीने से शरीर में कोई रोग नहीं होता, पाचनशक्ति बढ़ती है, जठराग्निने प्रबल बनती है और शरीर के तमाम अवयवों को उर्जा शक्ति प्राप्त होती है । पुरा जपान आज इस तरह से गरमा-गरम पानी पीता है । जैन साधु-साध्वीजीओं को भी इस तरह उबाला हुआ पानी जैसा टेम्परेचर वाला मिला हो वैसा ही काष्ठ के बर्तन में रखना होता है । जब जरुरत पड़े तब ठंडा किए बिना गरम ही पीना होता है । (आज पानी ठंडा करने का रीवाज सर्वत्र व्यापक बन गया है, लेकिन यह योग्य नही|)</p>
<p><strong>2. मीडियम वॉटर</strong> : &#8211; जिस पानी को उबालने के बाद ठंडा करके उपयोग में लेते हैं उसे मीडीयम वॉटर कहते है । यह पानी खास आरोग्यप्रद नही बनता ।</p>
<p><strong>3. बेड वॉटर</strong> : &#8211; जिस पानी को उबालने में नही आता, गरम करने के बजाए फ्रिज में ठंडा करने के लिये रखते हैं । वह जल (या कोल्ड्रींक्स) सबसे कनिष्ठ है । यह जल आरोग्य को हानि पहुँचाता है । आयुर्वेद के अनुसार सर्व रोगों का उत्पत्ति-स्थान पेट हैं । संपूर्ण खुराक को पचाने का काम पेट करता है, पर पेट का सत्यानाश करने का काम ठंडा पानी और ठंडे पेय करते हैं । पेट की प्रबल जठराग्रि कच्ची-पक्की जैसी भी रसोई हो उसे स्वाहा कर देती है परन्तु ठंडे पेय जठराग्नि को स्वाहा करते है। परमात्मा की सचित्तजल त्याग की बात हम मानते नही । लेकिन जब शहरो में चीकनगुनीया, मंकीगुनीया, टोमेटीगुनीया, कोलेरा, प्लेग और पीलीया के वायरस फैल जायें तब टी.वी. पर घोषणा होती हैं कि &#8216;पानी उबालकर पीयो ।&#8217; तब टी. वी. देवता को यस सर! करके उबाला हुआ पानी पीते हैं।</p>
<p><strong>कुछ सावधानियाँ : -</strong><br />
A. उबला हुआ पानी उपयोग मे लानेवालों को एक बात ध्यान में रखनी चाहिये कि पानी गरम नहीं परन्तु उबला हुआ उपयोग में लेना है । गरम करना और उबालना दोनों में फर्क है । चूले पर चढ़ाने के बाद सामान्य गरम करने से अचित्त नहीं होता । जब पानी उबालना हो तब चाय की नरह उसमें तीन उबाल आने चाहिये । प्रथम उबाल उगना है तब पानी सचित्त होता है । दूसरा उबाल आने पर मिश्र सचित्त-अचित्त) होता है और तीसरे उबाल आने पर पानी अचित्त होता है । इसलिये पूरे तीन उबाल आये बिना पानी चूले पर से उतार दे तो वह पानी नही चलता ।</p>
<p>B. उबाला पानी ठंडा करने के लिये परात में खुल्ला पड़ा रहता है । उसमें जीव-जन्तु गिरे तो विराधना होती है, इसलिये उस पर जाली ढांकना जरुरी है । उबलते पानी की परात जमीन पर रखने से भी किसी जीव की विराधना हो सकती है इसलिये पाट पर रखना चाहिये ।</p>
<p>C. तीन उबाल लिये हुए पानी को उतारते और ठंडा करते वक्त पूरा उपयोग रखना चाहिये । जिससे हाथ-पैर जलने या किसी के ऊपर गिरने का प्रसंग न बने ।</p>
<p>D. आकाश में उड़ते जीव तथा अप्काय के जीवों का गिरना संभव होने से उबला पानी कभी भी खुले आकाश के नीचे खुल्ला नहीं रखना । पानी का घडा या तपेली ले जाना हो तो ढांककर ले जाना ।</p>
<p>E. परात में ठंडा किया हुआ पानी ठंडा हुआ कि नहीं यह देखने के लिये सीधी ऊंगली अंदर डालने से नख का मैल पानी में मिलता है जिससे उसमें समूर्च्छिम जीव पैदा होते हैं । इसलिये मध्यमा अंगुली मोड़कर उल्टा करके स्पर्श करना चाहिये । यदि अंगुली पसीने या मैल वाली हो तो धो-पोंछकर फिर अंदर डालें ।</p>
<p>F. ठंडा किया हुआ पानी मटके में भरने से पहले मटके के अन्दर नजर करके पूंजनी से जयणा करनी चाहिये । अन्दर मच्छर वगैरह हो तो हिंसा होनी संभव है ।</p>
<p>G. उबला पानी बढ़ा हो तो सूर्यास्त पूर्व तुरन्त सूख जाए ऐसे तरीके से उसका विसर्जन करना चाहिये । गटर में डाल देना योग्य नहीं है। रोड़ पर, छत-आंगन में जयणा पूर्वक डाल सकते है ।</p>
<p>H. उबला पानी पीनेवाले को प्रवास में जाते वक्त पानी का साधन साथ में रखना चाहिये । कभी तकलिफ हो तो रेल्वे स्टेशन पर से कच्चा पानी छानकर कई लोग किसी भी स्थल पर गरम करवाकर उस पानी को उपयोग में लेते हैं । छुट्टे पच्चक्खानवाले को नींबू का शरबत या त्रिफला का पानी चल सकता है ।</p>
<p>I. राख का पानी, शक्कर का पानी, नींबू का पानी, त्रिफला का पानी दो घड़ी बाद अचित्त होता है । फिर उसका समय गरम पानी की तरह ही निर्धारीत होता है ।</p>
<p>J. उबला पानी ग्लास में पीने के तुरन्त बाद गिलास पोंछ लेना चाहिये । दूसरी बार लेना हो तो ग्लास पोंछे बिना लेना नहीं । झूठे गिलास में से छींटा घड़े में गिरे तो घड़े में असंख्य समूर्च्छिम पंचेन्द्रिय मनुष्य उत्पन्न होते है । इसलिये उपयोग रखना जरुरी है ।</p>
<p>K. उबला हुआ पानी ग्रीष्म में ५ प्रहर, ठंडी में ४ प्रहर और चौमासे में ३ प्रहर अचित्त रहता है । (एक प्रहर याने दिन का चौथाई भाग समझना । 1२ घंटे का दिन हो तो एक प्रहर तीन घंटे का गिनना) चौमासे में तीन प्रहर का काल होने से सबेरे उबाला हुआ पानी दोपहर तीन बजे तक चल सकता है उसके बाद उसका विसर्जन करना पड़ता है । दूसरे काल का पानी दस बजे के बाद चूले से उतारा हो तो सूर्यास्त तक चल सकता है ।</p>
<p>L. जहॉं आयंबिलशाला में पानी उबलता है वहाँ अजयना, हिंसा और बेदरकारी का कोई पार नहीं । सामान्य व्यक्तियों के हाथ में यह काम सौंपने से बहुत बड़ी गड़बड़ चलती है । 1. पानी छाने बिना गरम करते हैं ।<br />
2. पानी गरम किया हुआ यदि बढ़ गया हो तो तपेले में दूसरे दिन तक चूले पर ही पड़ा रहता है । सुबह उसमें बिना छना नया पानी मिलाकर उसे ही गरम कर देते हैं ।<br />
3. चूले का प्रमार्जन नहीं करते ।<br />
4. पानी सूर्योदय पूर्व ही चूले से उतार देते हैं ।<br />
5. पानी के तीन उबाल आये कि नहीं? उसकी राह नही देखते; भाँप निकले न निकले तुरन्त उतार देते हैं ।<br />
6. बड़ी परात में पानी पूरे दिन खुला पड़ा रहता हैं । उसमें धूल और कई जीव-जंतु गिरते है ।<br />
7. पानी उबालने के बर्तन पचास-पचास सालों तक कभी बदलने में नही आते । जब तक नया बर्तन नहीं आता और ये बर्तन टूटते नहीं तब तक उसे उल्टा करके साफ भी नहीं किया जाता ।<br />
8. मच्छरों से भरपूर उपाश्रयों में सबेरा होते ही सब मच्छर घड़े के पेंदे में बैठे रहते हैं । इन घड़ों का प्रमार्जन किये बिना ही पानी भरकर रख देते हैं । ऐसे हजारों प्रकार की अजयनाओं से उबला हुआ यह पानी, उबला हुआ होते हुए भी अनेक प्रदूषणों से प्रदूषित होता है । इस कारण आरोग्यप्रद नहीं हो सकता । इस विषय में ट्रस्टी महोदय, श्रावक-श्राविकाएँ स्वयं जाग्रत बनकर अपना समय दे तो सुधारा हो सकता है । बाकी मजदूर व्यक्ति और रसोइयाँ के लिये तो हॉटल और उपाश्रय एक समान हैं ।<br />
9. यदि श्रावक घर में हि पानी उबालते हो और रोज पीते हो तो साधु-साध्वीजी महाराज को आयंबिल खाता से प्रदूषित-जल ग्रहण नहीं करना पडे । श्रावकों को गोचरी के साथ-साथ पानी का भी लाभ मिलेगा।</p>
<p id="bte_opp"><small>Republished by  <a href="http://www.blogtrafficexchange.com/old-post-promoter/">Blog Post Promoter</a></small></p>]]></content:encoded>
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		<title>न खाने योग्य चीजे जिसमे अभक्ष्य पदार्थ</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/blog/%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%9c%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%ad</link>
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		<pubDate>Sat, 31 May 2025 12:36:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/food-600x269.jpg"/><br />
				<p><strong>न खाने योग्य चीजों में अभक्ष्य पदार्थ</strong></p>
<p>टोमेटो सूप : मक्खन&#8230;बासी<br />
मकाई का सूप : आजिनो मोटो<br />
व्हाईट वेजीटेबल सूप : गाजर, पाव<br />
वेजीटेबल सूप : फ्लावर, मक्खन<br />
रसीयन सूप : आलू, प्याज<br />
काकड़ी का सूप  : प्याज, पाव, बटर<br />
गाजर का सूप : गाजर, प्याज<br />
नॉन : मैंदा, मक्खन<br />
ग्रीन ग्रीनोरी कोफ्ता : पालक, प्याज<br />
चाईनीज फ्राईड रॉइस : आजीनो, गाजर<br />
पालक मटर पनीर : पनीर, पालक<br />
नरगीसी कोक्ता : गाजर, प्याज<br />
पनीर स्पीनेच कोफ्ता : पालक, प्याज<br />
बैंगन की आमटी : बैंगन, प्याज<br />
आलू मटर पनीर करी : आलू, लहसुन<br />
फालुदा : कन्डेशमिल्क, मैंदा<br />
अमेरिकन चोपसी : नुडल्स, आजीनो<br />
वेजीटेबल कबाब ग्रेवी : अदरक, ब्रेड<br />
ग्रीन पुलाव : फ्लावर<br />
ब्रेड पुलाव : स्लाइड ब्रेड<br />
स्पेनीश राईस : चीज<br />
पंजाबी समोसा : मैंदा, कंदमूल<br />
वेजी. कटलेस : मैंदा की पट्टी<br />
दहीं कचोरी, पेटीस : द्विदल, ब्रेड<br />
मारवाडी कचोरी : मैंदा की पट्टी<br />
ब्रेड के भजिये : ब्रेड<br />
सेन्डवीच भजिया : ब्रेड स्लाईड<br />
मोती वडा : साबूदाना<br />
पाव की पेटीस : पाव<br />
आलू ब्रेड रोल : ब्रेड, आलू<br />
ब्रेड का उपमा : पाव<br />
पौंआ बोल : स्लाइस ब्रेड<br />
फेंन्की : चीज, ब्रेड<br />
मेक्सीकन टाकोस : बेकड वीन्स-टोमेटो सॉस<br />
स्पेगेटी इटालियन : टोमोटो सॉस (बासी)<br />
पीजा : मैंदा की बासी रोटी<br />
गाजर का पुडींग : गाजर, बिस्कीट<br />
टोस्ट पेटीस : ब्रेड, पनीर<br />
कोम फूटे कठोल : अनंतकाय, अंकुरे<br />
दही पेटीस : द्विदल<br />
कसाटा आईस्क्रीम : ब्रान्डी, कस्टर्ड पाउडर<br />
पनीर कोप्ता करी : पनीर, प्याज, लहसून<br />
मोरीया का उपमा : आलू<br />
पंचरंगी कचूंबर : मूली, गाजर<br />
वेजीटेबल फ्रेन्की : आलू, गाजर, प्याज<br />
अदरक का मुरब्ब : अदरक<br />
लवली ब्रेड आईस्क्रीम : वेनीला एसेंस, ब्रेड<br />
वेजीटेबल ढ़ोकला : फ्लावर, आलू<br />
नरगीसी कोप्ता : मक्खन, प्याज<br />
चाईनीज बोकस : गाजर, प्याज, लहसून<br />
स्वादिष्ट फ्रुट चाट : ब्रेड<br />
आलू की भाकर वडी : आलू, अदरक<br />
आम की तिरंगी कटलेस : आलू, पालक, ब्रेड<br />
वेजीटेबल चीवडा : गाजर, लहसून<br />
केले की पुडींग : चोकलेट, वेनीला एसेंस<br />
दहीं जायफल पूलाव : प्याज, चीज, गाजर<br />
चमचम : पनीर<br />
मेंगो रोल : पनीर<br />
कोकोनट येलो राईस : प्याज<br />
स्पेनीश पुलाव : प्याजू, आलू<br />
फराली स्वीट केक : आलू<br />
गोल्डन टोस्ट : आलू, बटर, ब्रेड<br />
साबुदाने का चिवडा : साबुदाना<br />
फ्लावर स्टु : फ्लावर, कांदा<br />
तिरंगी जैली : जिलेटीन<br />
हरे चने का कटलेस : आलू<br />
नवरतन कुरमा : पनीर, गाजर, आलू<br />
आलू पालक : आलू, पालक<br />
चीज पीजा : चीज, पीजा<br />
वटाने के कोप्ते : प्याज, अदरक<br />
मेक्सीकन बेक वेजी. : गाजर, आलू<br />
गोभी के समोसे : अदरक<br />
मावा आलू : आलू<br />
पिझा बेस : पीझा<br />
गाजर की रबडी : गाजर<br />
फरारी पूरनपोली : आलू, साबूदाना<br />
दाल-राजमा मक्खनी : लहसून, प्याज<br />
केक : अंडे का रस<br />
शहंशाही कबाब : साबूदाना, आलू<br />
सनराईज कैबेज : आलू, प्याज<br />
मूंग की दाल के चटपटे : पालक, अदरक<br />
साग का भडथु : प्याज, लहसून<br />
सेव डबल रोटी : पाव, लहसून, प्याज<br />
सुरन के वडे : सुरण<br />
नारंगी कीफ्ता : ब्रेड<br />
टीकी सॉह मसाला : रतालु, प्याज, पाव<br />
वेजीटेबल पेन केक : प्याज, आलू, अदरक<br />
ठंडाई : खसखस<br />
आलू की चकरी : आलू, साबूदाना<br />
आलू पोहा : आलू<br />
केरी के कोफ्ता : पनीर<br />
बटर पीझा : बटर, पीझा<br />
पोहे की भेल : आलू<br />
गाजर की खीर : गाजर<br />
छोले भटुरे : प्याज, आलू<br />
वेजीटेबल पीझा : चीझ, प्याज, पीझा<br />
फरारी कटलेट : रतालु, गाजर, आलू<br />
करी : पनीर, गाजर, बेंगन<br />
अमृती : आलू, आरारोट<br />
चोकोनेट बोल्स : वेनीला, चॉकलेट बार<br />
कोफ्ता करी : प्याज, लहसून, आलू<br />
शक्करकंद की खिचडी : शक्करकंद<br />
ग्रीन पनीर : पनीर, आलू<br />
शीगोंडा के दहीं वडे : शींगोडा<br />
ब्रेड कोफ्ता : ब्रेड, पनीर<br />
चनादाल कोप्ता : आलू, प्याज, लहसून<br />
टमटम : आलू<br />
बर्डनेस्टर : आलू, प्याज<br />
वेजीटेबल कटलसे : आलू, टोस<br />
ब्रेड स्टीकस : आलू, ब्रेड, प्याज<br />
शाही केसर पनीर पुडींग : पनीर<br />
गाजर का पराठा : गाजर, आलू<br />
पोहे की कचोरी : आलू<br />
पनीर रोल : पनीर<br />
चीझ कटलेट : चीझ, आलू<br />
दिलबहार कोप्ता : आलू, गाजर, ब्रेड<br />
आलू के गुलाबजामुन : आलू<br />
शक्करकंद का हलवा : शक्करकंद<br />
हरी हल्दी की बरफी : हरी हल्दी, अदरक<br />
ईटालीयन पीझा : पीझा, प्याज<br />
मटर पनीर : पनीर, लहसून<br />
भटा भात : भटा<br />
गाजर का संदेश : गाजर<br />
अदरक वडा : अदरक<br />
मसाला करी : आलू, प्याज<br />
सुरण वडा : सुरण<br />
वेजीटेबल करी पफ फ्लावर, प्याज, लहसून<br />
हराभरा कोफ्ता : पालक, पनीर, आलू<br />
वेजीटेबल पीझा : चीज, प्याज, पीझा<br />
ऐसी अनगिनत चीजे होटलों में, शादियों में, घर में खाने से पहले अभक्ष्य हो तो त्याग करना यही शरीर और आत्मा के लिये हितकारी हैं।</p>
<p id="bte_opp"><small>Republished by  <a href="http://www.blogtrafficexchange.com/old-post-promoter/">Blog Post Promoter</a></small></p>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/food-600x269.jpg"/><br />
				<p><strong>न खाने योग्य चीजों में अभक्ष्य पदार्थ</strong></p>
<p>टोमेटो सूप : मक्खन&#8230;बासी<br />
मकाई का सूप : आजिनो मोटो<br />
व्हाईट वेजीटेबल सूप : गाजर, पाव<br />
वेजीटेबल सूप : फ्लावर, मक्खन<br />
रसीयन सूप : आलू, प्याज<br />
काकड़ी का सूप  : प्याज, पाव, बटर<br />
गाजर का सूप : गाजर, प्याज<br />
नॉन : मैंदा, मक्खन<br />
ग्रीन ग्रीनोरी कोफ्ता : पालक, प्याज<br />
चाईनीज फ्राईड रॉइस : आजीनो, गाजर<br />
पालक मटर पनीर : पनीर, पालक<br />
नरगीसी कोक्ता : गाजर, प्याज<br />
पनीर स्पीनेच कोफ्ता : पालक, प्याज<br />
बैंगन की आमटी : बैंगन, प्याज<br />
आलू मटर पनीर करी : आलू, लहसुन<br />
फालुदा : कन्डेशमिल्क, मैंदा<br />
अमेरिकन चोपसी : नुडल्स, आजीनो<br />
वेजीटेबल कबाब ग्रेवी : अदरक, ब्रेड<br />
ग्रीन पुलाव : फ्लावर<br />
ब्रेड पुलाव : स्लाइड ब्रेड<br />
स्पेनीश राईस : चीज<br />
पंजाबी समोसा : मैंदा, कंदमूल<br />
वेजी. कटलेस : मैंदा की पट्टी<br />
दहीं कचोरी, पेटीस : द्विदल, ब्रेड<br />
मारवाडी कचोरी : मैंदा की पट्टी<br />
ब्रेड के भजिये : ब्रेड<br />
सेन्डवीच भजिया : ब्रेड स्लाईड<br />
मोती वडा : साबूदाना<br />
पाव की पेटीस : पाव<br />
आलू ब्रेड रोल : ब्रेड, आलू<br />
ब्रेड का उपमा : पाव<br />
पौंआ बोल : स्लाइस ब्रेड<br />
फेंन्की : चीज, ब्रेड<br />
मेक्सीकन टाकोस : बेकड वीन्स-टोमेटो सॉस<br />
स्पेगेटी इटालियन : टोमोटो सॉस (बासी)<br />
पीजा : मैंदा की बासी रोटी<br />
गाजर का पुडींग : गाजर, बिस्कीट<br />
टोस्ट पेटीस : ब्रेड, पनीर<br />
कोम फूटे कठोल : अनंतकाय, अंकुरे<br />
दही पेटीस : द्विदल<br />
कसाटा आईस्क्रीम : ब्रान्डी, कस्टर्ड पाउडर<br />
पनीर कोप्ता करी : पनीर, प्याज, लहसून<br />
मोरीया का उपमा : आलू<br />
पंचरंगी कचूंबर : मूली, गाजर<br />
वेजीटेबल फ्रेन्की : आलू, गाजर, प्याज<br />
अदरक का मुरब्ब : अदरक<br />
लवली ब्रेड आईस्क्रीम : वेनीला एसेंस, ब्रेड<br />
वेजीटेबल ढ़ोकला : फ्लावर, आलू<br />
नरगीसी कोप्ता : मक्खन, प्याज<br />
चाईनीज बोकस : गाजर, प्याज, लहसून<br />
स्वादिष्ट फ्रुट चाट : ब्रेड<br />
आलू की भाकर वडी : आलू, अदरक<br />
आम की तिरंगी कटलेस : आलू, पालक, ब्रेड<br />
वेजीटेबल चीवडा : गाजर, लहसून<br />
केले की पुडींग : चोकलेट, वेनीला एसेंस<br />
दहीं जायफल पूलाव : प्याज, चीज, गाजर<br />
चमचम : पनीर<br />
मेंगो रोल : पनीर<br />
कोकोनट येलो राईस : प्याज<br />
स्पेनीश पुलाव : प्याजू, आलू<br />
फराली स्वीट केक : आलू<br />
गोल्डन टोस्ट : आलू, बटर, ब्रेड<br />
साबुदाने का चिवडा : साबुदाना<br />
फ्लावर स्टु : फ्लावर, कांदा<br />
तिरंगी जैली : जिलेटीन<br />
हरे चने का कटलेस : आलू<br />
नवरतन कुरमा : पनीर, गाजर, आलू<br />
आलू पालक : आलू, पालक<br />
चीज पीजा : चीज, पीजा<br />
वटाने के कोप्ते : प्याज, अदरक<br />
मेक्सीकन बेक वेजी. : गाजर, आलू<br />
गोभी के समोसे : अदरक<br />
मावा आलू : आलू<br />
पिझा बेस : पीझा<br />
गाजर की रबडी : गाजर<br />
फरारी पूरनपोली : आलू, साबूदाना<br />
दाल-राजमा मक्खनी : लहसून, प्याज<br />
केक : अंडे का रस<br />
शहंशाही कबाब : साबूदाना, आलू<br />
सनराईज कैबेज : आलू, प्याज<br />
मूंग की दाल के चटपटे : पालक, अदरक<br />
साग का भडथु : प्याज, लहसून<br />
सेव डबल रोटी : पाव, लहसून, प्याज<br />
सुरन के वडे : सुरण<br />
नारंगी कीफ्ता : ब्रेड<br />
टीकी सॉह मसाला : रतालु, प्याज, पाव<br />
वेजीटेबल पेन केक : प्याज, आलू, अदरक<br />
ठंडाई : खसखस<br />
आलू की चकरी : आलू, साबूदाना<br />
आलू पोहा : आलू<br />
केरी के कोफ्ता : पनीर<br />
बटर पीझा : बटर, पीझा<br />
पोहे की भेल : आलू<br />
गाजर की खीर : गाजर<br />
छोले भटुरे : प्याज, आलू<br />
वेजीटेबल पीझा : चीझ, प्याज, पीझा<br />
फरारी कटलेट : रतालु, गाजर, आलू<br />
करी : पनीर, गाजर, बेंगन<br />
अमृती : आलू, आरारोट<br />
चोकोनेट बोल्स : वेनीला, चॉकलेट बार<br />
कोफ्ता करी : प्याज, लहसून, आलू<br />
शक्करकंद की खिचडी : शक्करकंद<br />
ग्रीन पनीर : पनीर, आलू<br />
शीगोंडा के दहीं वडे : शींगोडा<br />
ब्रेड कोफ्ता : ब्रेड, पनीर<br />
चनादाल कोप्ता : आलू, प्याज, लहसून<br />
टमटम : आलू<br />
बर्डनेस्टर : आलू, प्याज<br />
वेजीटेबल कटलसे : आलू, टोस<br />
ब्रेड स्टीकस : आलू, ब्रेड, प्याज<br />
शाही केसर पनीर पुडींग : पनीर<br />
गाजर का पराठा : गाजर, आलू<br />
पोहे की कचोरी : आलू<br />
पनीर रोल : पनीर<br />
चीझ कटलेट : चीझ, आलू<br />
दिलबहार कोप्ता : आलू, गाजर, ब्रेड<br />
आलू के गुलाबजामुन : आलू<br />
शक्करकंद का हलवा : शक्करकंद<br />
हरी हल्दी की बरफी : हरी हल्दी, अदरक<br />
ईटालीयन पीझा : पीझा, प्याज<br />
मटर पनीर : पनीर, लहसून<br />
भटा भात : भटा<br />
गाजर का संदेश : गाजर<br />
अदरक वडा : अदरक<br />
मसाला करी : आलू, प्याज<br />
सुरण वडा : सुरण<br />
वेजीटेबल करी पफ फ्लावर, प्याज, लहसून<br />
हराभरा कोफ्ता : पालक, पनीर, आलू<br />
वेजीटेबल पीझा : चीज, प्याज, पीझा<br />
ऐसी अनगिनत चीजे होटलों में, शादियों में, घर में खाने से पहले अभक्ष्य हो तो त्याग करना यही शरीर और आत्मा के लिये हितकारी हैं।</p>
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		</item>
		<item>
		<title>आरोग्य का ज्ञानकोश</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/blog/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b6</link>
		<comments>https://www.jainrasoi.com/blog/%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b6#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 31 May 2025 00:15:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/health-600x369.jpg"/><br />
				<p><strong>आरोग्य का यह ज्ञानकोश संभालकर रखेंगे तो उपयोगी रहेगा :</strong></p>
<p><strong>अेडिटिव्झ :</strong> पांच हजार से ज्यादा वर्ष पहले, सर्व प्रथम मानव ने अपने खुराक में नमक का शुभारंभ किया । तब से लोग स्वाद बढ़ाने के लिए खुराक में कुछ न कुछ मिलाते रहते है । &#8220;मोनो सोडियम ग्लुकोनेट&#8217; नाम का एक पदार्थ हैं जो दाल, पीज़ा वगैरह में उपयोग करने से स्वाद बढ़ता है । चाइनीज़ वानगी में तो &#8216;आजिनोमोटो&#8217; होता ही है । इसके उपयोग से केन्सर होता है ।</p>
<p>इसके उपरांत तली हुई वेफर, बिस्किट और पेकेट की चीजें, जिसमें तेल या घी का उपयोग किया हुआ रहता है वह पेकेट काफी लंबे समय तक पड़े रहतें हैं तो तेल खोरा हो जाने से बिगड जाता है परंतु ऐसा न हो इसके लिये उसमें &#8216;अेन्टी ओक्सिडन्ट&#8217; कक्षा का रसायन डाले जाते है । आलू की वेफर और खारी बिस्किट में &#8220;बुटिलेटेल हाईड्रो अेक्सिटोल्युन&#8217; आता है । जिजसे चमड़ी बिगड़ती है, बच्चों का दिमाग खराब दोता है और बच्चें &#8220;हाईपरअेक्टीव&#8217; बनते हैं ।</p>
<p>ताजे फल और सागभाजी गुणकारी है, अब सूखे हुए फल या डब्बापेक फलों को सुंदर रूप में रखने के लिये उसमे कृत्रिम रंग डालने हैं । दूध का पाउडर सफेद दिखे उसके लिये उसमें कृत्रिम रंग डालते है । कन्डेन्स्ड मिल्क के डब्बे में इन्स्पन्ट कॉफी मे भी कृत्रिम रंग आता है । कृत्रिम रंग, कोलतार वि डामर में से बनता है । टारट्राजीन नाम का कृत्रिम रंग खाद्य पदार्थ में आता है, जो बच्चों को नुकसान पहुंचाता है ।</p>
<p>हॉटल में तुम पुडिंग या मिल्कशेक पीते हो, आईस्क्रीम खाते हो उसमें &#8216;ईमल्सीफायर और स्टेबीलाईजर&#8217; नाम का रसायन डालते हैं। मिल्कशेक और आईस्कीम को कृत्रिम रूप से गाढ़ा करने के लिये उसमें इमल्सीफायर डालते है । प्रायः सभी खाद्य पदार्थो में स्वाद और सुगन्ध लाने के लिए उसमें फ्लेवरींग एजन्ट डाला जाता है ।<br />
&#8220;मित्रों तुम जानते हो ? तुम्हारे दैनिक भोजन में तुम ५००० से भी ज्यादा अकुदरती रसायन लेते हो ! तुम हर वर्ष छः रत्ती से भी ज्यादा प्रमाण में बनावटी संरक्षक दवाईयाँ (Preservatives) के भोक्ता बनते हो ! परिणाम :- मोटापा, हृदयरोग, मधुप्रमेह और केन्सर जैसे रोंगो का शिकार बनते हो ।</p>
<p><strong>खाने पीने के शौक़ीन लोगो के पेट में कचरा डाला जा रहा हैं<br />
</strong>छले एक सप्ताह से सूरत में ऑरारेशन हेल्थ केयर चल रहा है । पिछले वर्ष सूरत में भारी बरसात और बाढ़ से हुई गंदगी में से प्लेग रोग निकला था । अनेक लोगों ने जान गंवाई।</p>
<p>स्वच्छता और आरोग्य की सुरक्षा के लिये लारी गल्ला, हॉटल, फेक्ट्रियों की चैंकिग हुई । सूरतवाले जिस पर टूट पडते थे वे खाद्य पदार्थ और उसमें उपयोग होते कच्चे माल की जाँच हुई । इस जाँच में मुह में पानी आने के बदले उब आये ऐसी हकीकत हाथ लगी ।</p>
<p>पंजाबी व्यंजनों में उपयोग किया जाने वाला कठोल सडा हुआ और जीवयुक्त था । तैयार लेमन ज्यूस की बोतलों में मकोडे और घी के बर्तन में कोकरोज ने समाधी ली थी । तैयार मिठाईयों पर जमीन पोछनेवाले कपड़े ढ़के थे । बिना ढ़की मिठाईयों पर बेशुमार मक्खीयाँ भिन-भिना रही थी । एसेंस और फुड कलर की एक्सपायर्ड डेट बीत गई थी । आम का रस निकालकर पैक करती फेक्ट्रियों में चिटी, मकोडी, इल्लियोंवाला सड़ा आम उपयोग में ले रहे थे । तैयार आचार गंध मार रहे थे । सडे हुये टमाटर से बने, बास मारते सॉस को पाउडर से बास रहित बनाकर पैक करते थे। बर्तनों पर से धूल और गंदगी की बात तो दूर रही परन्तु आजू बाजू में पडी चूहे की लेंडी को साफ करने की तकलीफ भी मालिक नहीं ले रहे थे। प्रख्यात बेकरी में फूलनवाले पाव को ओवन में सेंककर टोस्ट बनाने का काम चालू था। बाजू के संडास से आई हुई मक्खीयॉं बिस्किट और कच्ची सामग्री पर निरन्तर घूम रही थी।</p>
<p>सरकारी तंत्रने खाने के शौकीन सूरतवालों को इन सबकी जानकारी देकर संतोष माना कि, लालबत्ती धरने की फरज हमने अदा की अब लोग ध्यान रखेंगे; यह इनकी भूल थी। रविवार को खाने के शौकीन सुरतीलाला तो फिर वही उत्साह से लारी (ठेले), होटलों पर टूट पडे। थ्री स्टार, फाईव स्टार और सेवन स्टार होटलों का नाम सुनकर मुंह से लार टपकाता मानवों को अब तो सचमूच पता चलेगा कि, होम टु होटल और होटल टु हॉस्पिटल।</p>
<p><strong>डब्बा पैक फल, सागभाजी और टिंड बियर पुरुषों के वीर्य को दूषित करते है<br />
</strong>पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या समग्र विश्व में घट रही है इसका विवरण &#8216;अभियान &#8216; साप्ताहिक में छपने के बाद नये नये संशोधन के परिणाम बाहर आये हैं । उसके मुताबिक अब स्पेन के डॉक्टरों का मानना है कि डब्बापेक (टिन्ड) वेजीटेबल, फल और डब्बे में पेक बियर, डब्बे के अन्दर का रसायनवाला आवरण आदि पुरुष के वीर्य को दूषित करता हैं । &#8220;बिस्फेनोल-अे&#8217; (Bisphenol-A) नाम का रसायन फूडकेन्स के अन्दर के आवरण में उपयोग होता हैं । अन्दर की धातु खराब न हो इसलिये ये रासायनिक आवरण चढ़ाते हैं परन्तु ये रसायन खाद्य पदार्थो में जाता हैं और वह खाने से उसमें रहा हुआ ओस्ट्रोजन नाम का तत्त्व पुरुषों में नपुंसकता लाता हैं। बहूत सारी यूरोप की रसायन उत्पन्न करनेवाली कंपनियॉं इससे चिंता में पड गई हैं ।</p>
<p>लंदन टाईम्स के मेडिकल पत्रकार लोईस रोजर्स लिखते हैं कि पेट्रोल और प्लास्टिक उद्योग के रसायन स्त्री हार्मोन की नकल करते हैं । उपरांत स्त्रियाँ गर्भनिरोधक गोलियॉं, उसी तरह की दूसरी गोलियॉं खाती है । वह अंत में तो सूप्टी के जल भंडार में वापस जाती हैं और फिर वह पुरुषो के शरीर में जाकर हानि पहुंचाती है । इसलिये आजकल पुरुषों में नपुंसकता बढ़ती जा रही हे । टिन्ड फुड के डब्बो में थेलेट्‌स (Phthalates) नाम के रसायन का उपयोग होता है । वह भी वीर्य के ऊपर विपरीत असर करता हैं ।<br />
डिटरजन्ट्स और बच्चों को दूध पीलाने वाली प्लास्टिक की बॉटल के रसायन भी हानिकारक हैं ऐसा ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक कहते हैं । आजकल युगलों में बांझपन बढ़ता जा रहा हैं । संतानहीन युगलों की संख्या मुंबई में भी बहुत है, जिसे सलामत रहना है उन्हें कम से कम डब्बा पैक बियर, डब्बा पैक टोमेटो ज्यूस वगैरह आधुनिक पेय से दूर रहना चाहिये । संतान पैदा करनेवाली दवाई या उपचार करानेवाले को तो खास । डिब्बा पेक रसगुल्ला घर में हो तो संतान इच्छित पुरुष को उससे दूर रखना चाहिये । अभी तक यह भूल हुई हो उन लोगों के लिये यह एक मारण है । अब से इन खाद्य पदार्थो से दूर रहे और आंवले के मौसम में सबेरे रोज चार आवले का ताजा रस खाली पेट पीयो।</p>
<p><strong>जानलेवा रोगों के लिए जवाबदार है फास्टफूड-प्रोसेस्द्फुद और पेय पदार्थ<br />
</strong>चाय, कॉफी, दारु, ठंडापानी तथा बाजार में मिलनेवाले फास्टफुड और प्रोसेस्ड फुड, चॉकलेट वगैरह जानलेवा रोगों के लिये जवाबदार हैं । ऐसा आहार शरीर में जहर तो फैला रहा है । परन्तु उसके साथ शरीर के आवश्यक तत्वों की कमी भी पैदा कर रहा हैं ।</p>
<p>डॉ. गोकाणी बहुत स्पष्ट कहते हैं कि &#8216;ऐसे कमजोर खुराक से ब्लडप्रेशर कम ज्यादा होता रहता है । होरमोन्स में तकलीफ पैदा होती है । मूड में परिवर्तन होता रहता है। आज के बालक बिल्कुल असहिष्णु हो रहे है और पुरे समाज में अपराध बढ़ रहे है इन सबके पीछे यही कारण जवाबदार है ।&#8217;</p>
<p>हार्मोन्स के परिवर्तन से व्यक्ति चिडचिडा हो जाता है । उसकी अपेक्षायें बढ़ जाती है । जो पूर्ण न होने पर हताशा आती है और हताशा मानव को गुन्हाखोर बनाती है।</p>
<p><strong>नीचे की वस्तुओं को पहचानो और उससे बचो :</strong><br />
1. अेडिटीझ : खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक टिकाने के लिये रसायन डालते है । पैकेट के ऊपर ईमल्सीफायर्स, फेट्टी एसीड, ई ४७1 लिखा होता है । इन सब में गाय की चर्बी होती है तो भी &#8216;वेजीटेरियन फुड&#8217; का लेबल लगाते है ।<br />
2. अल्कोहोल-दारु-बियर : कई वाइन्स पीने से मांसाहार हो जाता है । बियर, दारु को रिफान्ड करने के लिये ड्रायब्लड (सूखा खून) या मछली में से निकलता आईसींग्लास उपयोग होता है । दो बियर की बॉटल पीये तो तुम्हारे पेट में २ औंस जितना खून या मछली का तत्व जाता है ।<br />
3. परदेश के बिस्किट में गाय की चर्बी, व्हे पाउडर डालते है बकरे के अँतडियों का अर्क है ।<br />
4. चीझ में उपयुक्त रेनेट बकरी या जन्में हुए बछडे का अर्क अेन्जाईन है । डुक्कर के पेट की चर्बी में से पेप्सीन बनता है । जो चीझ में उपयोग होता है ।<br />
5. च्युईंगम : च्युईंगम में उपयुक्त ग्लीसरीन गाय-बैल की चर्बी में से बनता है ।<br />
6. क्रिस्प : कुरकुरे नाश्ते की चीज चांवल की चकरी में व्हे का उपयोग होता है ।<br />
7. फीश ऑइल : बहुत सारे बिस्किट-केक-पेस्ट्री और मार्जरीन में मछली का सस्ता तेल उपयोग होता है। मार्जरीन सिंगतेल या वनस्पति तेल में से बनता है। परन्तु उसे मुलायम बनाने के लिये मछली का तेल डालना पडता है। जो ब्रेड पर लगाते है।<br />
8. जीलेटीन : गाय की हड्डी और पैर की खुर में से बनता है । जेली-आईस्क्री, चीझ, केक, विदेशी मिठाईयाँ उगैर मीन्ट मे उपयोग होता है । बहुत सारी आईस्क्रीम में जिलेटीन + चरबी + &#8220;ई&#8217; नाम का मासाहारी अेडीटीव उपयोग होता है ।<br />
9. आर्गेनीक पैदाशे : कुदरती खाद में से बनती साग भाजी बेचने से पहले सृखे खून, हड्‌्डी और मछली के चुरे में से बनाई हुई रसायन से धोते है, जो नुकसानकारी है ।<br />
10. सूप और सॉस : विदेश के स्टोर में वेजीटेरियन सुप-साँस विश्वसनीय नहीं होते । उसमें मछली के मांस का उपयोग होता है । मशीन के प्रथम चक्कर में चिकन कतराता है । फिर उसमे साग भाजी कतराती है ।<br />
11. स्वीट, कन्केकशनरी और अनेक पिपरमेंट में जिलेटीन, गाय की हड्‌डी का पाउडर डालते है ।<br />
12. टेकीला : अमेरिका में मेक्सीकन रेस्टारेंट में टेकीला नाम की दारु की बॉटल में उत्तेजना जाने वाले जीव डाले जाते है । इन जीवों का अर्क दारु के साथ पेट में जाता है ।<br />
13. लगभग टूथपेस्टों मे जिलेटीन (नं ८) होता है ।<br />
14. विटामिन D, B &#8211; 12, प्रवाही दवाई में चरबी, हड्‌डी का अंश होता है ।<br />
15. योगर्ट : गाय के दूध में दहीं जमाने के लिये &#8211; जिलेटीन का उपयोग होता है ।</p>
<p>ऊंचाई बढ़ाने के लिये मरे हुए मानव के गर्दन में से पीच्युटरी ग्रंथी निकालकर &#8216;ग्रोथ हार्मोन्स&#8217; बनता है । जो दवा ठिंगने बच्चों को देने के 2० वर्ष बाद मेड-काउडीझीझ के रोग से बहुत से बच्चों की मृत्यु हुई।</p>
<p>जीवन को बिगाडनेवाली बाहर की बहुत सारी चीजों से आज के समय में सबको बचना जरुरी है।</p>
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				<p><strong>आरोग्य का यह ज्ञानकोश संभालकर रखेंगे तो उपयोगी रहेगा :</strong></p>
<p><strong>अेडिटिव्झ :</strong> पांच हजार से ज्यादा वर्ष पहले, सर्व प्रथम मानव ने अपने खुराक में नमक का शुभारंभ किया । तब से लोग स्वाद बढ़ाने के लिए खुराक में कुछ न कुछ मिलाते रहते है । &#8220;मोनो सोडियम ग्लुकोनेट&#8217; नाम का एक पदार्थ हैं जो दाल, पीज़ा वगैरह में उपयोग करने से स्वाद बढ़ता है । चाइनीज़ वानगी में तो &#8216;आजिनोमोटो&#8217; होता ही है । इसके उपयोग से केन्सर होता है ।</p>
<p>इसके उपरांत तली हुई वेफर, बिस्किट और पेकेट की चीजें, जिसमें तेल या घी का उपयोग किया हुआ रहता है वह पेकेट काफी लंबे समय तक पड़े रहतें हैं तो तेल खोरा हो जाने से बिगड जाता है परंतु ऐसा न हो इसके लिये उसमें &#8216;अेन्टी ओक्सिडन्ट&#8217; कक्षा का रसायन डाले जाते है । आलू की वेफर और खारी बिस्किट में &#8220;बुटिलेटेल हाईड्रो अेक्सिटोल्युन&#8217; आता है । जिजसे चमड़ी बिगड़ती है, बच्चों का दिमाग खराब दोता है और बच्चें &#8220;हाईपरअेक्टीव&#8217; बनते हैं ।</p>
<p>ताजे फल और सागभाजी गुणकारी है, अब सूखे हुए फल या डब्बापेक फलों को सुंदर रूप में रखने के लिये उसमे कृत्रिम रंग डालने हैं । दूध का पाउडर सफेद दिखे उसके लिये उसमें कृत्रिम रंग डालते है । कन्डेन्स्ड मिल्क के डब्बे में इन्स्पन्ट कॉफी मे भी कृत्रिम रंग आता है । कृत्रिम रंग, कोलतार वि डामर में से बनता है । टारट्राजीन नाम का कृत्रिम रंग खाद्य पदार्थ में आता है, जो बच्चों को नुकसान पहुंचाता है ।</p>
<p>हॉटल में तुम पुडिंग या मिल्कशेक पीते हो, आईस्क्रीम खाते हो उसमें &#8216;ईमल्सीफायर और स्टेबीलाईजर&#8217; नाम का रसायन डालते हैं। मिल्कशेक और आईस्कीम को कृत्रिम रूप से गाढ़ा करने के लिये उसमें इमल्सीफायर डालते है । प्रायः सभी खाद्य पदार्थो में स्वाद और सुगन्ध लाने के लिए उसमें फ्लेवरींग एजन्ट डाला जाता है ।<br />
&#8220;मित्रों तुम जानते हो ? तुम्हारे दैनिक भोजन में तुम ५००० से भी ज्यादा अकुदरती रसायन लेते हो ! तुम हर वर्ष छः रत्ती से भी ज्यादा प्रमाण में बनावटी संरक्षक दवाईयाँ (Preservatives) के भोक्ता बनते हो ! परिणाम :- मोटापा, हृदयरोग, मधुप्रमेह और केन्सर जैसे रोंगो का शिकार बनते हो ।</p>
<p><strong>खाने पीने के शौक़ीन लोगो के पेट में कचरा डाला जा रहा हैं<br />
</strong>छले एक सप्ताह से सूरत में ऑरारेशन हेल्थ केयर चल रहा है । पिछले वर्ष सूरत में भारी बरसात और बाढ़ से हुई गंदगी में से प्लेग रोग निकला था । अनेक लोगों ने जान गंवाई।</p>
<p>स्वच्छता और आरोग्य की सुरक्षा के लिये लारी गल्ला, हॉटल, फेक्ट्रियों की चैंकिग हुई । सूरतवाले जिस पर टूट पडते थे वे खाद्य पदार्थ और उसमें उपयोग होते कच्चे माल की जाँच हुई । इस जाँच में मुह में पानी आने के बदले उब आये ऐसी हकीकत हाथ लगी ।</p>
<p>पंजाबी व्यंजनों में उपयोग किया जाने वाला कठोल सडा हुआ और जीवयुक्त था । तैयार लेमन ज्यूस की बोतलों में मकोडे और घी के बर्तन में कोकरोज ने समाधी ली थी । तैयार मिठाईयों पर जमीन पोछनेवाले कपड़े ढ़के थे । बिना ढ़की मिठाईयों पर बेशुमार मक्खीयाँ भिन-भिना रही थी । एसेंस और फुड कलर की एक्सपायर्ड डेट बीत गई थी । आम का रस निकालकर पैक करती फेक्ट्रियों में चिटी, मकोडी, इल्लियोंवाला सड़ा आम उपयोग में ले रहे थे । तैयार आचार गंध मार रहे थे । सडे हुये टमाटर से बने, बास मारते सॉस को पाउडर से बास रहित बनाकर पैक करते थे। बर्तनों पर से धूल और गंदगी की बात तो दूर रही परन्तु आजू बाजू में पडी चूहे की लेंडी को साफ करने की तकलीफ भी मालिक नहीं ले रहे थे। प्रख्यात बेकरी में फूलनवाले पाव को ओवन में सेंककर टोस्ट बनाने का काम चालू था। बाजू के संडास से आई हुई मक्खीयॉं बिस्किट और कच्ची सामग्री पर निरन्तर घूम रही थी।</p>
<p>सरकारी तंत्रने खाने के शौकीन सूरतवालों को इन सबकी जानकारी देकर संतोष माना कि, लालबत्ती धरने की फरज हमने अदा की अब लोग ध्यान रखेंगे; यह इनकी भूल थी। रविवार को खाने के शौकीन सुरतीलाला तो फिर वही उत्साह से लारी (ठेले), होटलों पर टूट पडे। थ्री स्टार, फाईव स्टार और सेवन स्टार होटलों का नाम सुनकर मुंह से लार टपकाता मानवों को अब तो सचमूच पता चलेगा कि, होम टु होटल और होटल टु हॉस्पिटल।</p>
<p><strong>डब्बा पैक फल, सागभाजी और टिंड बियर पुरुषों के वीर्य को दूषित करते है<br />
</strong>पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या समग्र विश्व में घट रही है इसका विवरण &#8216;अभियान &#8216; साप्ताहिक में छपने के बाद नये नये संशोधन के परिणाम बाहर आये हैं । उसके मुताबिक अब स्पेन के डॉक्टरों का मानना है कि डब्बापेक (टिन्ड) वेजीटेबल, फल और डब्बे में पेक बियर, डब्बे के अन्दर का रसायनवाला आवरण आदि पुरुष के वीर्य को दूषित करता हैं । &#8220;बिस्फेनोल-अे&#8217; (Bisphenol-A) नाम का रसायन फूडकेन्स के अन्दर के आवरण में उपयोग होता हैं । अन्दर की धातु खराब न हो इसलिये ये रासायनिक आवरण चढ़ाते हैं परन्तु ये रसायन खाद्य पदार्थो में जाता हैं और वह खाने से उसमें रहा हुआ ओस्ट्रोजन नाम का तत्त्व पुरुषों में नपुंसकता लाता हैं। बहूत सारी यूरोप की रसायन उत्पन्न करनेवाली कंपनियॉं इससे चिंता में पड गई हैं ।</p>
<p>लंदन टाईम्स के मेडिकल पत्रकार लोईस रोजर्स लिखते हैं कि पेट्रोल और प्लास्टिक उद्योग के रसायन स्त्री हार्मोन की नकल करते हैं । उपरांत स्त्रियाँ गर्भनिरोधक गोलियॉं, उसी तरह की दूसरी गोलियॉं खाती है । वह अंत में तो सूप्टी के जल भंडार में वापस जाती हैं और फिर वह पुरुषो के शरीर में जाकर हानि पहुंचाती है । इसलिये आजकल पुरुषों में नपुंसकता बढ़ती जा रही हे । टिन्ड फुड के डब्बो में थेलेट्‌स (Phthalates) नाम के रसायन का उपयोग होता है । वह भी वीर्य के ऊपर विपरीत असर करता हैं ।<br />
डिटरजन्ट्स और बच्चों को दूध पीलाने वाली प्लास्टिक की बॉटल के रसायन भी हानिकारक हैं ऐसा ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक कहते हैं । आजकल युगलों में बांझपन बढ़ता जा रहा हैं । संतानहीन युगलों की संख्या मुंबई में भी बहुत है, जिसे सलामत रहना है उन्हें कम से कम डब्बा पैक बियर, डब्बा पैक टोमेटो ज्यूस वगैरह आधुनिक पेय से दूर रहना चाहिये । संतान पैदा करनेवाली दवाई या उपचार करानेवाले को तो खास । डिब्बा पेक रसगुल्ला घर में हो तो संतान इच्छित पुरुष को उससे दूर रखना चाहिये । अभी तक यह भूल हुई हो उन लोगों के लिये यह एक मारण है । अब से इन खाद्य पदार्थो से दूर रहे और आंवले के मौसम में सबेरे रोज चार आवले का ताजा रस खाली पेट पीयो।</p>
<p><strong>जानलेवा रोगों के लिए जवाबदार है फास्टफूड-प्रोसेस्द्फुद और पेय पदार्थ<br />
</strong>चाय, कॉफी, दारु, ठंडापानी तथा बाजार में मिलनेवाले फास्टफुड और प्रोसेस्ड फुड, चॉकलेट वगैरह जानलेवा रोगों के लिये जवाबदार हैं । ऐसा आहार शरीर में जहर तो फैला रहा है । परन्तु उसके साथ शरीर के आवश्यक तत्वों की कमी भी पैदा कर रहा हैं ।</p>
<p>डॉ. गोकाणी बहुत स्पष्ट कहते हैं कि &#8216;ऐसे कमजोर खुराक से ब्लडप्रेशर कम ज्यादा होता रहता है । होरमोन्स में तकलीफ पैदा होती है । मूड में परिवर्तन होता रहता है। आज के बालक बिल्कुल असहिष्णु हो रहे है और पुरे समाज में अपराध बढ़ रहे है इन सबके पीछे यही कारण जवाबदार है ।&#8217;</p>
<p>हार्मोन्स के परिवर्तन से व्यक्ति चिडचिडा हो जाता है । उसकी अपेक्षायें बढ़ जाती है । जो पूर्ण न होने पर हताशा आती है और हताशा मानव को गुन्हाखोर बनाती है।</p>
<p><strong>नीचे की वस्तुओं को पहचानो और उससे बचो :</strong><br />
1. अेडिटीझ : खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक टिकाने के लिये रसायन डालते है । पैकेट के ऊपर ईमल्सीफायर्स, फेट्टी एसीड, ई ४७1 लिखा होता है । इन सब में गाय की चर्बी होती है तो भी &#8216;वेजीटेरियन फुड&#8217; का लेबल लगाते है ।<br />
2. अल्कोहोल-दारु-बियर : कई वाइन्स पीने से मांसाहार हो जाता है । बियर, दारु को रिफान्ड करने के लिये ड्रायब्लड (सूखा खून) या मछली में से निकलता आईसींग्लास उपयोग होता है । दो बियर की बॉटल पीये तो तुम्हारे पेट में २ औंस जितना खून या मछली का तत्व जाता है ।<br />
3. परदेश के बिस्किट में गाय की चर्बी, व्हे पाउडर डालते है बकरे के अँतडियों का अर्क है ।<br />
4. चीझ में उपयुक्त रेनेट बकरी या जन्में हुए बछडे का अर्क अेन्जाईन है । डुक्कर के पेट की चर्बी में से पेप्सीन बनता है । जो चीझ में उपयोग होता है ।<br />
5. च्युईंगम : च्युईंगम में उपयुक्त ग्लीसरीन गाय-बैल की चर्बी में से बनता है ।<br />
6. क्रिस्प : कुरकुरे नाश्ते की चीज चांवल की चकरी में व्हे का उपयोग होता है ।<br />
7. फीश ऑइल : बहुत सारे बिस्किट-केक-पेस्ट्री और मार्जरीन में मछली का सस्ता तेल उपयोग होता है। मार्जरीन सिंगतेल या वनस्पति तेल में से बनता है। परन्तु उसे मुलायम बनाने के लिये मछली का तेल डालना पडता है। जो ब्रेड पर लगाते है।<br />
8. जीलेटीन : गाय की हड्डी और पैर की खुर में से बनता है । जेली-आईस्क्री, चीझ, केक, विदेशी मिठाईयाँ उगैर मीन्ट मे उपयोग होता है । बहुत सारी आईस्क्रीम में जिलेटीन + चरबी + &#8220;ई&#8217; नाम का मासाहारी अेडीटीव उपयोग होता है ।<br />
9. आर्गेनीक पैदाशे : कुदरती खाद में से बनती साग भाजी बेचने से पहले सृखे खून, हड्‌्डी और मछली के चुरे में से बनाई हुई रसायन से धोते है, जो नुकसानकारी है ।<br />
10. सूप और सॉस : विदेश के स्टोर में वेजीटेरियन सुप-साँस विश्वसनीय नहीं होते । उसमें मछली के मांस का उपयोग होता है । मशीन के प्रथम चक्कर में चिकन कतराता है । फिर उसमे साग भाजी कतराती है ।<br />
11. स्वीट, कन्केकशनरी और अनेक पिपरमेंट में जिलेटीन, गाय की हड्‌डी का पाउडर डालते है ।<br />
12. टेकीला : अमेरिका में मेक्सीकन रेस्टारेंट में टेकीला नाम की दारु की बॉटल में उत्तेजना जाने वाले जीव डाले जाते है । इन जीवों का अर्क दारु के साथ पेट में जाता है ।<br />
13. लगभग टूथपेस्टों मे जिलेटीन (नं ८) होता है ।<br />
14. विटामिन D, B &#8211; 12, प्रवाही दवाई में चरबी, हड्‌डी का अंश होता है ।<br />
15. योगर्ट : गाय के दूध में दहीं जमाने के लिये &#8211; जिलेटीन का उपयोग होता है ।</p>
<p>ऊंचाई बढ़ाने के लिये मरे हुए मानव के गर्दन में से पीच्युटरी ग्रंथी निकालकर &#8216;ग्रोथ हार्मोन्स&#8217; बनता है । जो दवा ठिंगने बच्चों को देने के 2० वर्ष बाद मेड-काउडीझीझ के रोग से बहुत से बच्चों की मृत्यु हुई।</p>
<p>जीवन को बिगाडनेवाली बाहर की बहुत सारी चीजों से आज के समय में सबको बचना जरुरी है।</p>
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		<item>
		<title>Idli Dabeli</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/snacks-starters/idli-dabeli</link>
		<comments>https://www.jainrasoi.com/snacks-starters/idli-dabeli#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 30 May 2025 12:08:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Snacks & Starters]]></category>
		<category><![CDATA[40]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2013/03/idli-dabeli-600x444.jpg"/><br />
		All time favourite Dabeli with a South Indian touch.<br />		<p>*For the Idli<br />
300 gram rice (uncooked)<br />
100 gram Urad Dal<br />
1 teaspoon methi seeds<br />
1 teaspoon eno<br />
salt to taste<br />
*For the Dabeli<br />
4 raw bananas<br />
6 tablespoons green <a href="https://www.jainrasoi.com/pickles-chutneys/coriander-green-chutney" title="Jain Coriander Chutney">coriander chutney</a><br />
6 tablespoons <a href="https://www.jainrasoi.com/pickles-chutneys/khajur-imli-ki-chutney" title="Jain Khajur Imli Ki Chutney">meethi chutney</a><br />
2 tablespoons chopped coriander<br />
2 teaspoons dabeli masala<br />
2-3 tablespoons pomegranate seeds<br />
1 tablespoon oil</p>
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		All time favourite Dabeli with a South Indian touch.<br />		<p>*For the Idli<br />
300 gram rice (uncooked)<br />
100 gram Urad Dal<br />
1 teaspoon methi seeds<br />
1 teaspoon eno<br />
salt to taste<br />
*For the Dabeli<br />
4 raw bananas<br />
6 tablespoons green <a href="https://www.jainrasoi.com/pickles-chutneys/coriander-green-chutney" title="Jain Coriander Chutney">coriander chutney</a><br />
6 tablespoons <a href="https://www.jainrasoi.com/pickles-chutneys/khajur-imli-ki-chutney" title="Jain Khajur Imli Ki Chutney">meethi chutney</a><br />
2 tablespoons chopped coriander<br />
2 teaspoons dabeli masala<br />
2-3 tablespoons pomegranate seeds<br />
1 tablespoon oil</p>
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		</item>
		<item>
		<title>22 अभक्ष्य पदार्थ &#8211; पार्ट 2</title>
		<link>https://www.jainrasoi.com/blog/22-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f-2</link>
		<comments>https://www.jainrasoi.com/blog/22-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f-2#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 29 May 2025 11:41:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>jainrasoi23</dc:creator>
				<category><![CDATA[Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/Kheer-600x398.jpg"/><br />
				<p><strong>A] 4 सांयोगिक अभक्ष्य</strong></p>
<p><strong>2] चलित रस का त्याग</strong></p>
<p><strong></strong>चलितरस का त्याग यह जैन दर्शन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है । कोई दर्शनकारों की या वैज्ञानिकों भी की जहाँ नजर नहीं पहुंची वहाँ प्रभु महावीर की दृष्टि पहुंची हैं । प्रभु ने फरमाया हैं कि- भक्ष्य कहलाते पदार्थ भी जब उनके असली स्वरूप, ओरिजीनल स्वाद, सुगंध, स्पर्श और कलर खो बैठते है तब वे अभक्ष्य बन जाते है । ये पदार्थों के भक्षण में जीवों की हिंसा तो होती ही है साथ में आरोग्य की भी हानि होती है ।</p>
<p>जैसे मेडिकल फैक्टरी में बनती दवाओं के लेबल पर उसकी एक्सपायरी डेट छपती है । मर्यादित समय के बाद इन दवाओं का पावर खत्म हो जाता है । जैसे घर में रहे हुए फर्निचर भी कुछ समय बाद सड़ने लगते हैं । जैसे प्लास्टिक की बाल्टी भी टूटती है । वैसे ही हर एक पदार्थ के सलामत रहने की एक टाईम लिमीट होती है। यह लीमीट पूरी होते ही उन पदार्थों का स्वरुप भी बदलने लगता है । पदार्थ का स्वरूप बदलने पर पदार्थ भक्ष्य होने पर भी अभक्ष्य बन जाता है ।</p>
<p>ऐसे सड़ते हुए पदार्थों में हिलते-चलते त्रस जीव, फूलन, निगोद के जीव उत्पन्न होते है जो आरोग्य को हानि पहुचाते है और आत्मा को हिंसा का भयंकर दोष लगता है । ऐसे चलितरस वाले पदार्थो के भक्षण से फुडपॉइज़न, डायरियॉं आदि केस कई जगह पर बनते है । चलितरस का मतलब जिसका स्वाद चलायमान हो गया हो, वे पदार्थ । उपसंहार से जिसका वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, चलायमान हो गया हो, अलबत्त, चला गया हो वे सब चलितरस कहलाते हैं । इस कारण जैनदर्शन ने कई पदार्थों की फिक्स काल मर्यादा निश्चित की है । परन्तु कभी बनावट या, मिलावट में भूल होने के कारण अंडर लीमीट भी पदार्थों का स्वरूप बदल जाता है । तो वे पदार्थ अंडरलीमीट होते हुए भी अभक्ष्य हो जाते है । उदा. : &#8211; बूंदी के लड्‌डू की 1५ दिन तक की मर्यादा हैं परन्तु लड्‌डू बनाकर गरम &#8211; गरम ही डब्बे में भर दिये । रात्रि में उसमे से भाँप का पानी निकलेगा । भाँप के पानी के कारण सबेरे लड्‌हु का स्वाद तथा कलर दोनों बदल जायेगा, उस पर काय उग जाएगी । ये लड्‌डु 15 दिन के बदले दूसरे दिन ही अभक्ष्य बन जायेगा। अब हम क्रमशः चलितरसवाले पदार्थोंको समझेंगे।</p>
<p><strong>i) दूसरे दिन अभक्ष्य बनते पदार्थ : </strong></p>
<p>जिन पदार्थो में पानी का अंश रहा जाता है वे सभी पदार्थ &#8216;बासी&#8217; कहलाते है | पानी स्वयं एक ऐसी ताकत रखता है कि वो जिस पदार्थ के साथ मिलता है, उस पदार्थ को थोड़े समाया में ही सड़ा देता है |</p>
<p><strong>रात बासी पदार्थ :</strong><br />
रोटला / रोटली / भाकरी<br />
पुडला<br />
भजिया<br />
वडा<br />
समोसा<br />
दूधपाक / खीर<br />
मलाई<br />
बासुंदी<br />
फ्रुटसलाद<br />
गुलाब जामुन<br />
जलेबी<br />
बंगाली मिठाई<br />
पानीवाली चटनी</p>
<p><strong>ii) बहुत दिनों बाद अभक्ष्य बनते पदार्थ :</strong><br />
जैन दर्शन ने सूखे पदार्थो की एक स्टैण्डर्ड लिमिट निश्चित की है | जिन पदार्थो को सेककर बनाते है, जिन पदार्थो को तलकर बनाते है, जिन पदार्थो को चासनी बनाकर रखते है | वे पदार्थ उपरोक्त दीर्घ समय तक भी सलामत रह सकतें हैं | एसे पदार्थों की समय मर्यादा में सीज़न के अनुसार परिवर्तन करने में आती है |</p>
<p><strong>a) शिशिर :</strong> का. सुद १५ से फा. सुद १४ तक (टाइम लिमिट &#8211; ३० दिन)<br />
<strong>b) ग्रीष्म :</strong> फा. सुद १५ से अ. सुद १४ तक (टाइम लिमिट &#8211; २० दिन)<br />
<strong>c) वर्षा :</strong> अ. सुद १५ से का. सुद १४ तक (टाइम लिमिट &#8211; १५ दिन)</p>
<p><strong>iii) बहुत महिनों बाद अभक्ष्य बनते पदार्थ :</strong><br />
कई पदार्थों का प्राकृतिक स्वरूप ही ऐसा होता हैं कि वे चार-आठ महीने तक चल सकते हैं | कई पदार्थो कि तैयार करने की पध्दति इतनी जोरदार होती है कि वे पदार्थ लम्बे समय तक चल सकते हैं | उदा. पापड़, बड़ी, खिचिया</p>
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			<content:encoded><![CDATA[<img width="600" src="https://www.jainrasoi.com/mg/wp-content/uploads/2015/05/Kheer-600x398.jpg"/><br />
				<p><strong>A] 4 सांयोगिक अभक्ष्य</strong></p>
<p><strong>2] चलित रस का त्याग</strong></p>
<p><strong></strong>चलितरस का त्याग यह जैन दर्शन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है । कोई दर्शनकारों की या वैज्ञानिकों भी की जहाँ नजर नहीं पहुंची वहाँ प्रभु महावीर की दृष्टि पहुंची हैं । प्रभु ने फरमाया हैं कि- भक्ष्य कहलाते पदार्थ भी जब उनके असली स्वरूप, ओरिजीनल स्वाद, सुगंध, स्पर्श और कलर खो बैठते है तब वे अभक्ष्य बन जाते है । ये पदार्थों के भक्षण में जीवों की हिंसा तो होती ही है साथ में आरोग्य की भी हानि होती है ।</p>
<p>जैसे मेडिकल फैक्टरी में बनती दवाओं के लेबल पर उसकी एक्सपायरी डेट छपती है । मर्यादित समय के बाद इन दवाओं का पावर खत्म हो जाता है । जैसे घर में रहे हुए फर्निचर भी कुछ समय बाद सड़ने लगते हैं । जैसे प्लास्टिक की बाल्टी भी टूटती है । वैसे ही हर एक पदार्थ के सलामत रहने की एक टाईम लिमीट होती है। यह लीमीट पूरी होते ही उन पदार्थों का स्वरुप भी बदलने लगता है । पदार्थ का स्वरूप बदलने पर पदार्थ भक्ष्य होने पर भी अभक्ष्य बन जाता है ।</p>
<p>ऐसे सड़ते हुए पदार्थों में हिलते-चलते त्रस जीव, फूलन, निगोद के जीव उत्पन्न होते है जो आरोग्य को हानि पहुचाते है और आत्मा को हिंसा का भयंकर दोष लगता है । ऐसे चलितरस वाले पदार्थो के भक्षण से फुडपॉइज़न, डायरियॉं आदि केस कई जगह पर बनते है । चलितरस का मतलब जिसका स्वाद चलायमान हो गया हो, वे पदार्थ । उपसंहार से जिसका वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, चलायमान हो गया हो, अलबत्त, चला गया हो वे सब चलितरस कहलाते हैं । इस कारण जैनदर्शन ने कई पदार्थों की फिक्स काल मर्यादा निश्चित की है । परन्तु कभी बनावट या, मिलावट में भूल होने के कारण अंडर लीमीट भी पदार्थों का स्वरूप बदल जाता है । तो वे पदार्थ अंडरलीमीट होते हुए भी अभक्ष्य हो जाते है । उदा. : &#8211; बूंदी के लड्‌डू की 1५ दिन तक की मर्यादा हैं परन्तु लड्‌डू बनाकर गरम &#8211; गरम ही डब्बे में भर दिये । रात्रि में उसमे से भाँप का पानी निकलेगा । भाँप के पानी के कारण सबेरे लड्‌हु का स्वाद तथा कलर दोनों बदल जायेगा, उस पर काय उग जाएगी । ये लड्‌डु 15 दिन के बदले दूसरे दिन ही अभक्ष्य बन जायेगा। अब हम क्रमशः चलितरसवाले पदार्थोंको समझेंगे।</p>
<p><strong>i) दूसरे दिन अभक्ष्य बनते पदार्थ : </strong></p>
<p>जिन पदार्थो में पानी का अंश रहा जाता है वे सभी पदार्थ &#8216;बासी&#8217; कहलाते है | पानी स्वयं एक ऐसी ताकत रखता है कि वो जिस पदार्थ के साथ मिलता है, उस पदार्थ को थोड़े समाया में ही सड़ा देता है |</p>
<p><strong>रात बासी पदार्थ :</strong><br />
रोटला / रोटली / भाकरी<br />
पुडला<br />
भजिया<br />
वडा<br />
समोसा<br />
दूधपाक / खीर<br />
मलाई<br />
बासुंदी<br />
फ्रुटसलाद<br />
गुलाब जामुन<br />
जलेबी<br />
बंगाली मिठाई<br />
पानीवाली चटनी</p>
<p><strong>ii) बहुत दिनों बाद अभक्ष्य बनते पदार्थ :</strong><br />
जैन दर्शन ने सूखे पदार्थो की एक स्टैण्डर्ड लिमिट निश्चित की है | जिन पदार्थो को सेककर बनाते है, जिन पदार्थो को तलकर बनाते है, जिन पदार्थो को चासनी बनाकर रखते है | वे पदार्थ उपरोक्त दीर्घ समय तक भी सलामत रह सकतें हैं | एसे पदार्थों की समय मर्यादा में सीज़न के अनुसार परिवर्तन करने में आती है |</p>
<p><strong>a) शिशिर :</strong> का. सुद १५ से फा. सुद १४ तक (टाइम लिमिट &#8211; ३० दिन)<br />
<strong>b) ग्रीष्म :</strong> फा. सुद १५ से अ. सुद १४ तक (टाइम लिमिट &#8211; २० दिन)<br />
<strong>c) वर्षा :</strong> अ. सुद १५ से का. सुद १४ तक (टाइम लिमिट &#8211; १५ दिन)</p>
<p><strong>iii) बहुत महिनों बाद अभक्ष्य बनते पदार्थ :</strong><br />
कई पदार्थों का प्राकृतिक स्वरूप ही ऐसा होता हैं कि वे चार-आठ महीने तक चल सकते हैं | कई पदार्थो कि तैयार करने की पध्दति इतनी जोरदार होती है कि वे पदार्थ लम्बे समय तक चल सकते हैं | उदा. पापड़, बड़ी, खिचिया</p>
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