कच्चा पानी, उबला पानी Recipe by Jain Rasoi 203 days ago

कच्चा पानी, उबला पानी
    जैनदर्शन ने जो जीवविज्ञान दर्शाया है । उसमें पानी को भी जीव स्वरुप माना गया हैं । आज का विज्ञान पानी में जीव मानता है, पर पानी को जीव नहीं मानता । जैसे वनस्पति स्वयं जीव स्वरुप हैं वैसे ही पानी भी स्वयं जीव स्वरुप है । शाकभाजी समारकर पकाने से जीवरहित बनती है वैसे ही पानी भी उबालने से जीवरहित बनता है ।

    कच्चे पानी में हर समय असंख्य जीव अपने आप मरते हैं और अपने आप पैदा होते हैं । पानी को जब तक गरम नहीं करते तब तक ये जनम मरण की साइकल सतत चलती रहती है । पानी को एक बार गरम कर लेने से क्षण-क्षण में जो असंख्य जीवों के जन्म-मरण की श्रेणि चलती है वह स्टॉप हो जाती है । पानी को उबालने में एक बार असंख्य जीवों की हिंसा होती ही है । उसके बदले कच्चा पानी पी ले तो भी शरीर में जाने के बाद उन जीवों की हिंसा होनेवाली ही है । शरीर की गरमी से जीवों को हानि होती है । इसलिये पानी कच्चा पीना या गरम करके पीना दोनों में हिंसा तो होनी ही है । परंन्तु दोनों परिस्थिति मै फर्क इतना है कि सीधे कच्चा पानी पीने से जीवित जीव सीधे मुख में डालने की धृष्टता करनी पडती है । जब कि उबले पानी का पान करते समय मुख में जीवित नहीं परन्तु निर्जीव पदार्थ का प्रवेश होता है ।

    कच्चा पानी सीधे मुख में डालना और उबला पानी मुख में डालना दोनों समय मन के परिणाम में फर्क पड़ता है । कच्चा पानी पीते वक्त ये जीव है, ऐसा ख्याल होते हुए भी व्यक्ति क्रूर बनकर पानी को पेट में डालता है । जबकि उबला पानी पीते वक्त व्यक्ति का मन यह समझता हैं कि यह जल निर्जीव है, अचित्त है । मैं मेरे मुख में जीवों को नहीं मारता, जल अचित्त करके फिर मैंने जल का उपयोग किया है । जल में क्षण-क्षण जो जन्म-मरण की साइकल चलती थी वह साइकल जल को एक बार उबाल लेने के बाद नियत समय के लिये स्टॉप हो जाती है । अब जल जब तक अचित्त रहेगा तब तक कोई नई जीवोत्पत्ति नही होगी ।

    यह प्रथम बात हुई हिंसा-अहिंसा और अपने चित्त परिणाम की । अब दुसरी बात :- कच्चा पानी आयुर्वेद की दृष्टि से विकारक कहलाता है ।
    कच्चा पानी पीने से व्यक्ति के मन में विकारभाव ज्यादा प्रमाण में जाग्रत होते हैं । इसलिये ब्रह्मचर्य के परिपालन के लिये तथा वीर्यरक्षा के लिये भी कच्चा पानी त्याग देना हितकारी हैं ।
    तीसरे नंबर पर आज के साइंस ने अभी-अभी वॉटर के तीन विभाग दर्शायें है :-
    1. बेस्ट वॉटर
    2. मीडियम वॉटर
    3. बेड वॉटर

    1. बेस्ट वॉटर : - उबला हुआ गरम पानी बेस्ट वॉटर हैं । ऐसा गरम पानी पीने से शरीर में कोई रोग नहीं होता, पाचनशक्ति बढ़ती है, जठराग्निने प्रबल बनती है और शरीर के तमाम अवयवों को उर्जा शक्ति प्राप्त होती है । पुरा जपान आज इस तरह से गरमा-गरम पानी पीता है । जैन साधु-साध्वीजीओं को भी इस तरह उबाला हुआ पानी जैसा टेम्परेचर वाला मिला हो वैसा ही काष्ठ के बर्तन में रखना होता है । जब जरुरत पड़े तब ठंडा किए बिना गरम ही पीना होता है । (आज पानी ठंडा करने का रीवाज सर्वत्र व्यापक बन गया है, लेकिन यह योग्य नही|)

    2. मीडियम वॉटर : - जिस पानी को उबालने के बाद ठंडा करके उपयोग में लेते हैं उसे मीडीयम वॉटर कहते है । यह पानी खास आरोग्यप्रद नही बनता ।

    3. बेड वॉटर : - जिस पानी को उबालने में नही आता, गरम करने के बजाए फ्रिज में ठंडा करने के लिये रखते हैं । वह जल (या कोल्ड्रींक्स) सबसे कनिष्ठ है । यह जल आरोग्य को हानि पहुँचाता है । आयुर्वेद के अनुसार सर्व रोगों का उत्पत्ति-स्थान पेट हैं । संपूर्ण खुराक को पचाने का काम पेट करता है, पर पेट का सत्यानाश करने का काम ठंडा पानी और ठंडे पेय करते हैं । पेट की प्रबल जठराग्रि कच्ची-पक्की जैसी भी रसोई हो उसे स्वाहा कर देती है परन्तु ठंडे पेय जठराग्नि को स्वाहा करते है। परमात्मा की सचित्तजल त्याग की बात हम मानते नही । लेकिन जब शहरो में चीकनगुनीया, मंकीगुनीया, टोमेटीगुनीया, कोलेरा, प्लेग और पीलीया के वायरस फैल जायें तब टी.वी. पर घोषणा होती हैं कि 'पानी उबालकर पीयो ।' तब टी. वी. देवता को यस सर! करके उबाला हुआ पानी पीते हैं।

    कुछ सावधानियाँ : -
    A. उबला हुआ पानी उपयोग मे लानेवालों को एक बात ध्यान में रखनी चाहिये कि पानी गरम नहीं परन्तु उबला हुआ उपयोग में लेना है । गरम करना और उबालना दोनों में फर्क है । चूले पर चढ़ाने के बाद सामान्य गरम करने से अचित्त नहीं होता । जब पानी उबालना हो तब चाय की नरह उसमें तीन उबाल आने चाहिये । प्रथम उबाल उगना है तब पानी सचित्त होता है । दूसरा उबाल आने पर मिश्र सचित्त-अचित्त) होता है और तीसरे उबाल आने पर पानी अचित्त होता है । इसलिये पूरे तीन उबाल आये बिना पानी चूले पर से उतार दे तो वह पानी नही चलता ।

    B. उबाला पानी ठंडा करने के लिये परात में खुल्ला पड़ा रहता है । उसमें जीव-जन्तु गिरे तो विराधना होती है, इसलिये उस पर जाली ढांकना जरुरी है । उबलते पानी की परात जमीन पर रखने से भी किसी जीव की विराधना हो सकती है इसलिये पाट पर रखना चाहिये ।

    C. तीन उबाल लिये हुए पानी को उतारते और ठंडा करते वक्त पूरा उपयोग रखना चाहिये । जिससे हाथ-पैर जलने या किसी के ऊपर गिरने का प्रसंग न बने ।

    D. आकाश में उड़ते जीव तथा अप्काय के जीवों का गिरना संभव होने से उबला पानी कभी भी खुले आकाश के नीचे खुल्ला नहीं रखना । पानी का घडा या तपेली ले जाना हो तो ढांककर ले जाना ।

    E. परात में ठंडा किया हुआ पानी ठंडा हुआ कि नहीं यह देखने के लिये सीधी ऊंगली अंदर डालने से नख का मैल पानी में मिलता है जिससे उसमें समूर्च्छिम जीव पैदा होते हैं । इसलिये मध्यमा अंगुली मोड़कर उल्टा करके स्पर्श करना चाहिये । यदि अंगुली पसीने या मैल वाली हो तो धो-पोंछकर फिर अंदर डालें ।

    F. ठंडा किया हुआ पानी मटके में भरने से पहले मटके के अन्दर नजर करके पूंजनी से जयणा करनी चाहिये । अन्दर मच्छर वगैरह हो तो हिंसा होनी संभव है ।

    G. उबला पानी बढ़ा हो तो सूर्यास्त पूर्व तुरन्त सूख जाए ऐसे तरीके से उसका विसर्जन करना चाहिये । गटर में डाल देना योग्य नहीं है। रोड़ पर, छत-आंगन में जयणा पूर्वक डाल सकते है ।

    H. उबला पानी पीनेवाले को प्रवास में जाते वक्त पानी का साधन साथ में रखना चाहिये । कभी तकलिफ हो तो रेल्वे स्टेशन पर से कच्चा पानी छानकर कई लोग किसी भी स्थल पर गरम करवाकर उस पानी को उपयोग में लेते हैं । छुट्टे पच्चक्खानवाले को नींबू का शरबत या त्रिफला का पानी चल सकता है ।

    I. राख का पानी, शक्कर का पानी, नींबू का पानी, त्रिफला का पानी दो घड़ी बाद अचित्त होता है । फिर उसका समय गरम पानी की तरह ही निर्धारीत होता है ।

    J. उबला पानी ग्लास में पीने के तुरन्त बाद गिलास पोंछ लेना चाहिये । दूसरी बार लेना हो तो ग्लास पोंछे बिना लेना नहीं । झूठे गिलास में से छींटा घड़े में गिरे तो घड़े में असंख्य समूर्च्छिम पंचेन्द्रिय मनुष्य उत्पन्न होते है । इसलिये उपयोग रखना जरुरी है ।

    K. उबला हुआ पानी ग्रीष्म में ५ प्रहर, ठंडी में ४ प्रहर और चौमासे में ३ प्रहर अचित्त रहता है । (एक प्रहर याने दिन का चौथाई भाग समझना । 1२ घंटे का दिन हो तो एक प्रहर तीन घंटे का गिनना) चौमासे में तीन प्रहर का काल होने से सबेरे उबाला हुआ पानी दोपहर तीन बजे तक चल सकता है उसके बाद उसका विसर्जन करना पड़ता है । दूसरे काल का पानी दस बजे के बाद चूले से उतारा हो तो सूर्यास्त तक चल सकता है ।

    L. जहॉं आयंबिलशाला में पानी उबलता है वहाँ अजयना, हिंसा और बेदरकारी का कोई पार नहीं । सामान्य व्यक्तियों के हाथ में यह काम सौंपने से बहुत बड़ी गड़बड़ चलती है । 1. पानी छाने बिना गरम करते हैं ।
    2. पानी गरम किया हुआ यदि बढ़ गया हो तो तपेले में दूसरे दिन तक चूले पर ही पड़ा रहता है । सुबह उसमें बिना छना नया पानी मिलाकर उसे ही गरम कर देते हैं ।
    3. चूले का प्रमार्जन नहीं करते ।
    4. पानी सूर्योदय पूर्व ही चूले से उतार देते हैं ।
    5. पानी के तीन उबाल आये कि नहीं? उसकी राह नही देखते; भाँप निकले न निकले तुरन्त उतार देते हैं ।
    6. बड़ी परात में पानी पूरे दिन खुला पड़ा रहता हैं । उसमें धूल और कई जीव-जंतु गिरते है ।
    7. पानी उबालने के बर्तन पचास-पचास सालों तक कभी बदलने में नही आते । जब तक नया बर्तन नहीं आता और ये बर्तन टूटते नहीं तब तक उसे उल्टा करके साफ भी नहीं किया जाता ।
    8. मच्छरों से भरपूर उपाश्रयों में सबेरा होते ही सब मच्छर घड़े के पेंदे में बैठे रहते हैं । इन घड़ों का प्रमार्जन किये बिना ही पानी भरकर रख देते हैं । ऐसे हजारों प्रकार की अजयनाओं से उबला हुआ यह पानी, उबला हुआ होते हुए भी अनेक प्रदूषणों से प्रदूषित होता है । इस कारण आरोग्यप्रद नहीं हो सकता । इस विषय में ट्रस्टी महोदय, श्रावक-श्राविकाएँ स्वयं जाग्रत बनकर अपना समय दे तो सुधारा हो सकता है । बाकी मजदूर व्यक्ति और रसोइयाँ के लिये तो हॉटल और उपाश्रय एक समान हैं ।
    9. यदि श्रावक घर में हि पानी उबालते हो और रोज पीते हो तो साधु-साध्वीजी महाराज को आयंबिल खाता से प्रदूषित-जल ग्रहण नहीं करना पडे । श्रावकों को गोचरी के साथ-साथ पानी का भी लाभ मिलेगा।
Source : Research of Dining Table by Acharya Hemratna Suriji

 

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